

Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
नाना पाटेकर चले गए। वही दिल का दौरा… पचहत्तर साल का आदमी अब बहुत बूढ़ा नहीं होता, पर जाने की कोई उम्र भी नहीं होती…
नाना हमेशा प्रिय रहे। प्रहार के मेजर चौहान, तिरंगा के शिवाजी राव वागले, कोहराम के मेजर आर्या, क्रांतिवीर के प्रताप, वेलकम के उदय शेट्टी… वे हर रोल में प्रिय रहे… उनकी एक एक फिल्म सैकड़ों पर भारी रही। इसमें कोई संदेह नहीं कि अभिनेता के रूप में सिनेमा इंडस्ट्री के बड़े बड़े उस्ताद उनके आगे पानी भरते रहे।
लंबे समय तक हमलोगों के लिए पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का अर्थ ही झंडा फहराने के बाद तिरंगा और कोहराम देखना रहा है। गांव के वीडियो हॉल( यह क्या होता है, बस गांव वाले जानते हैं) में हर बार यही फिल्में चलतीं और हमलोग तीन रुपए के टिकट पर देखते। नाना पाटेकर का “पहले लात, फिर बात और अंत में मुलाकात” वाला तेवर हर बार ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के “ना तलवार की धार से, न गोलियों की बौछार से…” पर भारी पड़ता रहा। उस उम्र में यही तेवर पसंद आता है न…
नाना ने अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में सबसे कम फिल्मों में काम किया होगा। शायद हिंदी में पचास फिल्में भी पूरी नहीं हुई होंगी। पर उनकी हर फिल्म यादगार है… उनकी हर फिल्म को केवल उनके लिए दो बार देखा जा सकता है, बकवास फिल्मों में भी उनका अभिनय यादगार है। एक सांस में उतने लंबे लंबे डायलॉग बोलना बस उन्हीं के बस की बात थी, और इस बात की क्या ही बात थी।
जिस तरह अमिताभ बच्चन अपनी दूसरी पारी में पहली से बेहतर हो कर लौटे, वैसे ही नाना पाटेकर भी… वे बुढ़ापे की फिल्मों में अधिक निखर कर आए थे। किसे उम्मीद थी कि “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…” वाले नाना पाटेकर कभी ” कंट्रोल उदय कंट्रोल”और ” दौलत है, शोहरत है, इज्जत है..” करते भी दिखेंगे। राजनीति, मुंबई अटैक, वनवास, और अंतिम वेब सीरीज… उनके अभिनय का दायरा बढ़ गया था, वे कमाल कर रहे थे। उम्मीद थी कि उनका कुछ और यादगार काम आएगा, पर नियति की अपनी योजनाएं हैं…
नाना इंडस्ट्री में हो कर भी इंडस्ट्री के नहीं थे। मन लायक फिल्म मिली तो किए, वरना घर बैठे रहे… पार्टियों से दूर गांव घर में रहे, खेती की, खुद से खाना पकाया खाया… इधर तो बिल्कुल ही गांव के हो गए थे।
नाना अपनी फिल्मों और जोरदार अभिनय के लिए हमेशा याद रहेंगे। अलविदा विश्वनाथ गजानन पाटेकर…
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।