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लेकिन हत्यारों और अन्य अपराधियों को मीडिया को इस तरह इंज्वाय करने से ज़रुर बचना चाहिए

-दयानंद पांडेय की कलम से-

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Positive India:Dayanand Pandey:
यह तो होना ही था। योगी सरकार ने तो नहीं , 3 सिरफिरे हत्यारों ने अतीक़ अहमद और उस के भाई अशरफ़ को मिट्टी में मिला दिया। मीडिया तो अपराधियों को इंज्वाय करने का अभ्यस्त हो ही चला है लेकिन हत्यारों और अन्य अपराधियों को मीडिया को इस तरह इंज्वाय करने से ज़रुर बचना चाहिए। क्यों कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोग अब शब्दों में ही नहीं , गोली में भी ढूंढने लगे हैं। इस बात को कम से कम हत्यारों को ज़रूर समझ लेना चाहिए। विकास दुबे से लगायत अतीक़ अहमद तक की कथा यही बताती है। फिर हत्यारा अतीक़ अहमद तो पूरी हेकड़ी से मीडिया को इंज्वाय कर रहा था। इतना ही नहीं , एक दिन बड़े इत्मीनान से कह रहा था कि मीडिया के कारण ही वह हिफाज़त से है। तब उस ने या किसी भी ने कल्पना नहीं की थी कि फर्जी ही सही , मीडिया वाले ही उस के हत्यारे हो जाएंगे।

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उत्तर प्रदेश में एक नाम है हरिशंकर तिवारी। एक समय हरिशंकर तिवारी के कारनामों के चलते अपराध के चलते गोरखपुर की तुलना अमरीका के शिकागो से की जाती थी। लेकिन हरिशंकर तिवारी ने कभी मीडिया को इंज्वाय नहीं किया। जब कि मीडिया पर उन की पकड़ और संपर्क बहुत बढ़िया और ज़बरदस्त रहा है। गोरखपुर से लखनऊ तक बहुत से मीडियाकर्मियों से उन के मधुर संबंध रहे हैं और कि हैं। तिवारी ने कई सारे मीडियाकर्मियों की नौकरी भी खाई और बहुत सारे मीडियाकर्मियों को नौकरियां भी दिलवाते रहे। कई बार तो संपादक भी वह तय करवा देते थे। ख़बरों को प्लांट करने में उन का जवाब नहीं था। लेकिन कैमरे आदि के सामने आने से वह मुसलसल बचते रहते थे। गोरखपुर के अखबारों में एक समय तो बाक़ायदा तय हो गया था कि जितनी ख़बर माफ़िया हरिशंकर तिवारी की छपेगी , उतनी ही माफ़िया वीरेंद्र शाही की भी। एक लाइन या एक कालम भी कम नहीं। सालों-साल यह सिलसिला चला है। कहूं कि कोई तीन दशक तक यह सिलसिला जारी रहा।

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गोरखपुर के पत्रकारों में इस बात को ले कर बहुत दहशत रहती थी। हर्षवर्धन शाही इन दिनों लखनऊ में सूचना आयुक्त हैं। एक समय गोरखपुर के एक अख़बार में नई-नई नौकरी कर रहे थे। उन को यह सब बहुत बुरा लगता था। एक बार वीरेंद्र शाही की लंबी-चौड़ी विज्ञप्ति अवसर मिलते ही चोरी से फाड़ कर फेंक दिया। दूसरे दिन वीरेंद्र शाही की वह विज्ञप्ति नहीं छपी तो अख़बार की क्लास ले ली वीरेंद्र शाही ने। अंतत : किसी ने पता किया कि विज्ञप्ति किस ने ग़ायब की। फाड़ी हुई विज्ञप्ति भी मिल गई। हर्षवर्धन शाही का तबादला उसी दिन गोरखपुर से बस्ती कर दिया गया। ऐसे अनेक क़िस्से हैं , गोरखपुर से लखनऊ तक के। एक बार दैनिक जागरण , कानपुर से ट्रांसफर हो एक रिपोर्टर झा साहब गोरखपुर पहुंचे। हरिशंकर तिवारी के ख़िलाफ़ एक विज्ञप्ति टाइप ख़बर छाप दिया। तिवारी के लोगों ने झा को फ़ोन कर तिवारी के घर बड़े मनुहार से बुलाया। जिसे गोरखपुर में हाता नाम से पुकारा जाता है। रिपोर्टर झा पहुंचे तिवारी के घर। बड़ी विनम्रता से तिवारी ने उन का स्वागत किया। उन की ख़ूब तारीफ़ की। और बर्फी भरी एक प्लेट रख दी। कहा खाइए। और लीजिए , और लीजिए की मनुहार भी करते रहे। झा भी अजब पेटू थे। कोई 32 बर्फी खा गए। फिर जब चलने लगे तो झा को लगातार 32 झन्नाटेदार थप्पड़ भी रसीद किए गए। जितनी बर्फी , उतने ही थप्पड़। झा के गाल लाल ही नहीं , गरम भी हो गए। वह भयवश कोई प्रतिरोध भी नहीं कर पाए। ध्वस्त हो कर वह किसी तरह दफ़्तर पहुंचे और रो पड़े। फूट-फूट कर रोए। कहा कि उन का ट्रांसफर तुरंत वापस कानपुर कर दिया जाए। गोरखपुर में वह अब एक दिन भी नहीं रहना चाहते। तुरंत तो नहीं पर जल्दी ही उन का ट्रांसफर वापस कानपुर हो गया।

हरिशंकर तिवारी और गोरखनाथ मंदिर का रिश्ता सर्वदा से छत्तीस का रहा है। हरिशंकर तिवारी का माफ़िया अवतार ही गोरखनाथ मंदिर के ख़िलाफ़ हुआ। यह अवतार करवाया था एक आई ए एस अफ़सर सूरतिनारायण मणि त्रिपाठी ने। गोरखपुर विश्विद्यालय के फाउंडर मेंबर थे तब गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजय सिंह। गोरखपुर के तत्कालीन कमिश्नर सूरतिनारायण मणि त्रिपाठी भी फाउंडर मेंबर थे। थे तो आचार्य कृपलानी जैसे लोग भी। पर कार्यकारिणी की जब भी कोई बैठक होती दिग्विजयनाथ भारी पड़ जाते। मंदिर के लठैत दिग्विजयनाथ के लिए खड़े हो जाते। लाचार हो कर सूरतिनारायण मणि त्रिपाठी ने एक दबंग की तलाश शुरू की। हरिशंकर तिवारी तब विश्विद्यालय के छात्र थे। दबंग थे। मणि ने तिवारी को तैयार किया। मंदिर के ख़िलाफ़ खड़ा किया तिवारी को। कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनीतिज्ञों का आशीर्वाद मिला तिवारी को। बाद के दिनों में तिवारी बड़े ठेकेदार बन गए। इस की एक लंबी अंतर्कथा है। जो फिर कभी। पर तिवारी के खिलाफ दो मोर्चे लगातार खुले रहे। एक गोरखनाथ मंदिर का दूसरे , वीरेंद्र शाही का। बीच-बीच में और भी कई। फिर 1986 में जब वीरबहादुर सिंह मुख्य मंत्री हुए तो उन्हों ठेके -पट्टे के मामले में न सिर्फ़ तिवारी की कमर तोड़ दी बल्कि एन एस लगा कर तिवारी और शाही दोनों को जेल भेज दिया।

बाद के दिनों में समय पलटा और तिवारी कैबिनेट मंत्री भी बने। शाही की हत्या हो गई। पर मंदिर और हाता का मोर्चा खुला रहा। फिर जब योगी मुख्य मंत्री बने 2017 में तो तिवारी मीडिया तो छोड़िए , सार्वजनिक जीवन से भी अपनी सक्रियता समाप्त कर दी तिवारी ने। अपने दोनों बेटों को भी निष्क्रिय करवा दिया। शुरू -शुरू में कुछ छापेमारी वगैरह हुई। पर मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए जैसे मेढक ग़ायब हो जाता है , सर्दी और गर्मी में , पूरी तरह ग़ायब हो गए। अब तो सुनता हूं , बढ़ती उम्र के कारण वह अस्वस्थ भी हैं। हरिशंकर तिवारी और चाहे जो हों , आप जो भी कहें पर उन के तीन-चार गुण बहुत प्रबल हैं। एक तो वह निजी बातचीत में अतिशय विनम्र हैं। अहंकार बिलकुल नहीं है। शराब , औरत आदि का व्यसन बिलकुल नहीं है। फिर रास्ता कैसे बदला जाता है , उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक से सीखना चाहिए। ज़िक्र ज़रूरी है कि बृजेश पाठक एक समय न सिर्फ़ ठेकेदारी बल्कि दबंगई में भी हरिशंकर तिवारी के ख़ास लेफ्टिनेंट रहे हैं। यहां तक कि लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी हरिशंकर तिवारी का आशीर्वाद ले कर वह विजयी हुए थे।

वैसे भी जो होशियार अपराधी होते हैं , सत्ता के ट्रक से अपनी साइकिल को नहीं लड़ाते। तिवारी ने भी तमाम विपरीत स्थितियां बारंबार देखीं पर कभी ऐसा नहीं किया। ऐसे , जैसे अतीक़ अहमद पूरी दबंगई और हेकड़ी से अपनी साइकिल सत्ता के ट्रक से टकराता रहा। मुस्लिम होने , मुस्लिम वोट बैंक का नशा उस पर मरते समय तक तारी था। मीडिया इंज्वाय करता रहा , ऐसे जैसे पान चबा रहा हो , पान मसाला खा रहा है। अतीक़ और उस के छोटे भाई अशरफ़ की गोली लगने के पहले तक की बॉडी लैंग्वेज देखिए। निश्चितता देखिए। हेकड़ी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की युगलबंदी देखिए। अपराधी होने की ज़रा भी शर्म नहीं है चेहरे पर। जवान बेटा मारा जा चुका है , पर चेहरे पर उस का भी बहुत अफ़सोस नहीं दिख रहा। न कोई बेचैनी और दुःख। मीडिया को बाइट ऐसे दे रहे हैं , अहंकार और ऐंठ में चूर हो कर गोया वह सचमुच कोई बहुत बड़ा पुण्य कर के बतिया रहे हैं। फिर कबीर वैसे ही तो नहीं लिख गए हैं : एक लाख पूत, सवा लाख नाती, ता रावण घर, दीया ना बाती !

साभार:दयानंद पांडेय-(ये लेखक के अपने विचार है)

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