

Positive India: Dayanand Pandey:
अब तो मेट्रो की बयार है । पर 1981 में जब दिल्ली में नौकरी करने लगा था तब पाया था कि डी टी सी के ज़्यादातर बस स्टैंड के आसपास पान की दुकान होती थी । उन पान की दुकानों के किनारे पर एक पतली रस्सी लगातार सुलगती रहती थी । लोग बाग उस सुलगती रस्सी से अपनी-अपनी सिगरेट सुलगाया करते थे । मुझे यह देख कर बहुत बुरा लगता था । गो कि सिगरेट तब ही पीता था , जब कोई पिलाता था । ख़ुद कभी नहीं ख़रीदता था ।
बहरहाल, सुलगती रस्सी से सिगरेट सुलगाना, सिगरेट का ज़ायक़ा ख़राब करना होता था । जो लुत्फ़ और सुरूर माचिस की तीली से सिगरेट सुलगाने में था , वह किसी सुलगती रस्सी में तनिक भी नहीं था । माचिस की तीली से सिगरेट सुलगाने में लगता था जैसे ख़ुद सुलग रहे हों । नसें तड़क जाती थीं । सुलगती रस्सी से सिगरेट में यह सुरूर और सुलगन स्वाहा हो जाती थी । मुर्दों जैसी फीलिंग आती थी । भारतीय राजनीति में राहुल गांधी वही सुलगती रस्सी हैं ।
सत्ता का स्वाद चखने के लिए वह ख़ुद तो निरंतर सुलगते रहते हैं । पर जिस भी मुद्दे को वह छूते हैं , मुर्दा बना देते हैं । कुछ दिनों में उस का ख़ुद ही श्राद्ध कर देते हैं । राफेल , सावरकर , ई वी एम, वोट चोरी , हाइड्रोजन बम आदि-इत्यादि से लगायत कोई एक भी मामला निर्णायक मोड़ पर वह ले गए हों तो कोई बताए भी ।
चौकीदार चोर है , सावरकर जैसे मुद्दों पर शपथपूर्वक अदालत में माफ़ी मांग चुके हैं । चिल्लाते रहे , माफीवीर सावरकर नहीं हूं, राहुल गांधी हूं । पर शपथ पूर्वक अदालत में माफ़ी मांग बैठे । फिर सावरकर का नाम ही वह भूल गए । उन की ब्रिगेड भी । मुख्य चुनाव आयुक्त मामले का भी जल्दी ही वह श्राद्ध कर कोई और मुर्दा मुद्दा उठा लेंगे , अगला श्राद्ध करने के लिए ।
देखते रहिए !
जैसे कि एक न्यूज़ चैनल अपने एक शो में बाकायदा ब्लैक बोर्ड लगा कर न्यूज़ समझाता है , राहुल गांधी भी बाक़ायदा ब्लैक बोर्ड और तमाम इधर -उधर के विजुअल आदि दिखाते हुए प्रेस कांफ्रेंस कर देश को पढ़ाने का आनंद देते और लेते हैं । लेकिन कुछ कांग्रेसियों और मीडिया को छोड़ कर उन की क्लास कोई पढ़ता नहीं । वोट चोर , गद्दी छोड़ की क्लास वह पढ़ाते रहते हैं । पर कुछ कांग्रेसियों और मीडिया वालों को छोड़ कर सब उन की क्लास बंक कर जाते हैं ।
रिजल्ट ख़राब हो जाता है ।
अब राहुल गांधी ने स्टैंडअप कमेडियनो को भी आज़माना शुरू किया है । संदीप दीक्षित के साथ मेलोनी सीन में पिटने के बाद अब वह सेटिंग वाली माँ में भी मुँह की खा गए हैं ।
हिंदी फ़िल्मों के एक बड़े अभिनेता थे राज कुमार । राहुल गांधी कई बार राजकुमार से भी प्रेरणा ले लेते हैं । कई वाक़ये हैं राजकुमार के । पर एक वाक़या सुनिए । रामायण फ़ेम रामानंद सागर एक फ़िल्म बना रहे थे , आँखें । राजकुमार को फ़िल्म का हीरो बनाना चाहते थे । समय लिया और गए राजकुमार के घर । कहानी सुनाई । राजकुमार को कहानी पसंद आ गई । पर साईन करने के पहले उन्हों ने अपने कुत्ते को अपने पास बुलाया और उस से पूछा , यह फ़िल्म कर लूं ? कुत्ते न , न में सिर हिला दिया । बड़े अफ़सोस के साथ राजकुमार , रामानंद सागर से बोले , यह तो मना कर रहा है !
रामानंद सागर चुपचाप उठ कर चले गए । बाद में धर्मेंद्र हीरो बने आँखें की और फ़िल्म सुपर हिट रही । सुनते हैं राहुल गांधी भी अपने कुत्तों और सिक्योरिटी गार्डों की सलाह से राजनीतिक सलाह लेते रहते हैं । ग़ुलाम नबी आज़ाद , हिमंत बिश्वशर्मा ने ऐसे खुलासे किए भी हैं । बाक़ी के सी वेणुगोपाल, जयराम रमेश , पवन खेड़ा आदि उन की सलाहकार मंडली भी किन स्वामी भक्त श्वानों से कम है ?
एक बड़े पत्रकार हुए हैं विनोद मेहता । बहुत सफल और प्रतिष्ठित संपादकों में शुमार हैं । लेकिन पत्रकारिता के पतन के चलते उन्हों ने अपने कुत्ते का नाम ही एडिटर रख दिया था । एक बार निजी बातचीत में मुझे उन्हों ने यह बताया था । क्या पता कहीं राहुल गांधी ने भी अपने किसी कुत्ते का नाम पी एम या एल ओ पी रख रखा हो ।
आख़िर सुलगती रस्सी हैं । और इस रस्सी में ऐंठ बहुत है।
साभार:दयानंद पांडेय-(में लेखक के अपने विचार हैं)