
ऐसी निमिषाओं के दुःखद अंत की चर्चा ही अन्य बच्चियों को निमिषा होने से बचाएगी
-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
यह निमिषा है, निमिषा ठाकुरिया। गुवाहाटी यूनिवर्सिटी की छात्रा, उम्र बाइस वर्ष। साथ में दिख रहा लड़का उसका लव है, आशिक अली। लड़का रैपिडो में ड्राइवर है।
दोनों कैसे मिले होंगे? कभी निमिषा ने रैपिडो बुक किया होगा, लड़के के पास उसका नंबर आया होगा। फिर वाट्सअप पर गुड मॉर्निग, हेलो, मैं हूँ ना… टाइप की बातें। प्रेम की बातें, समय पर हाजिर हो कर स्पेशल फील कराना, और फिर लव…
भाई साहब। यह तो पूछिए ही मत कि पढ़ी लिखी लड़कियां इन ड्राइवर, डिलीवरी ब्वाय के चक्कर में कैसे आती हैं। उत्तर बहुत सहज है। सोलह से चौबीस वाली उम्र में बच्चे ढूंढ़ते हैं फुल्ल इज्जत। जो प्यार से बात करेगा, जो स्पेशल फील कराएगा, जो बड्डे, फ्रेंड्स एनिवर्सरी, बल्कि महीने महीने मंथ एनिवर्सरी पर विश करेगा वही प्यारा लगने लगेगा। व्यक्ति का नहीं, उम्र का दोष है यह… उसमें भी था।
तो लड़की प्रेम में थी। सिनेमा से लेकर यूट्यूब, फेसबुक इंस्टा पर बताया ही जा रहा है कि जाति धर्म इज ओल्ड फैशन बेबी! बेबी का क्या दोष, आदमी जैसा देखता है वैसा ही समझता है।
उसके बाद? कुछ लोगों ने समझाने का प्रयास किया, पर नहीं समझी। मैं हमेशा कहता हूँ, फंसने के बाद आप नहीं समझा सकेंगे। वह चाहे भी तो नहीं समझ सकेगी। आपके दिखाये गए भय को प्रेमी अपने प्रेम से मार देगा… और यूँ भी, उस दशा में प्रेम का रंग चटक और ज्ञान का फीका होता है। समझाना पहले होता है, तब तो केवल परसेंटाइल पर फोकस करते हैं मम्मी पापा।
और लव की महिमा तो यह है साहब कि तेरह साल की बच्ची अपने ब्वायफ्रेंड के साथ कहीं सुनसान में भटकती मिले तो हम सभी उसके साथ खड़े हो जाते हैं कि लोग कौन होते हैं टोकने वाले? ब्वायफ्रेंड के साथ घूमना कोई अपराध है क्या? जैसे लव ही तो जीवन का मूल लक्ष्य है, उसके बिना जीवन बेकार… ऐसे में निमिषा ने कुछ अजीब तो नहीं ही किया था।
खैर। निमिषा बिना घर पर बताये अपने लव आशिक अली के साथ घूमने गयी थी। पांच दिन के बाद एक रात मम्मी को फोन किया कि “मां बचा लो, यह लोग मुझे मार रहे हैं। मेरी छाती पर मारते हैं…” उसके बाद निमिषा का शव मिला है।
ऐसी घटनाओं पर बार बार लिखने बोलने का कारण यह नहीं कि मैं उसे निर्दोष सिद्ध करूँ और आप उसे चरित्रहीन कह कर खिल्ली उड़ाएं। वह जैसी भी थी, मर गयी। कारण यह है कि ऐसी निमिषाओं के दुःखद अंत की चर्चा ही अन्य बच्चियों को निमिषा होने से बचाएगी। वरना दर्जनों स्वरायें, सोनाक्षीयां उन्हें इस और धकेल रही हैं। उनका क्या, उन्हें तो इसके बदले अकूत धन मिलता है, पर निमिषाओं को सबकुछ गँवा कर मरना पड़ता है।
साभार:सर्वेश कुमार तिवारी(यह लेखक के अपने विचार है)