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क्या आप जानते हैं भारत में राष्ट्रवाद कैसे आया ?

-राजकमल गोस्वामी की कलम से-

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Positive India:Rajkamal Goswami:
काल के जिस खंड में महमूद भारत के अंदर घुस कर कालिंजर से लेकर सोमनाथ तक लूटपाट कर रहा था ठीक उसी कालखंड में चोल साम्राज्य गंगा से लेकर बंगाल मलेशिया इंडोनेशिया से लेकर श्रीलंका और मालदीव तक पूरे हिंद महासागर तक हिलोरें मार रहा था । कहते एक बार महमूद ग़ज़नवी और राजेंद्र चोल की सेनाएँ मात्र २०० मीटर की दूरी से बिना लड़े हुए निकल गईं । राजेंद्र चोल भारत के सर्वकालीन महान सम्राटों और विजेताओं में एक था । जिस समय सोमनाथ तोड़ा जा रहा था राजेंद्र चोल बंगाल बिहार की विजय के उपलक्ष्य में अपनी नई राजधानी गंगैकोंडाचोलपुरम का निर्माण करवा रहा था जिसमें तंजौर की तर्ज़ पर एक और वृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया गया है ।

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आपने सोचा है कभी इतनी विशाल शक्ति ने उस दुर्दांत आक्रांता से भारत भूमि की रक्षा क्यों नहीं की ? क्यों पृथ्वीराज चौहान को ग़ोरी के विरूद्ध अकेले लड़ना पड़ा । क्यों दिल्ली के सुल्तानों और मुग़लों ने एक एक राजपूत राज्य से अकेले अकेले युद्ध किया । राजपूत इकट्ठे क्यों नहीं हो सके । दूर की छोड़िए अभी पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली, रुहेले और अवध के नवाब मिल कर लड़ रहे थे जबकि मराठे हज़ार किलोमीटर दक्षिण से आकर अकेले पूरे भारत की तक़दीर का फ़ैसला कर रहे थे । भारत का भाग्य तय करने वाली इस लड़ाई में कोई भी स्थानीय शक्ति मराठों के साथ होती तो फ़ैसला कुछ और होता । भरतपुर के प्रतापी जाट राजा सूरजमल, राजपूतों के अनेक राज्य , सिखों की ताक़तवर मिस्लें सब तमाशबीन बनी रहीं राजेंद्र चोल की तरह और अब्दाली महमूद की तरह लूटपाट करके निकल गया ।

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इसमें हमारे राजाओं का इतना दोष नहीं है । भारत में उस समय एक राजनीतिक राष्ट्रवाद का जन्म ही नहीं हुआ था । सांस्कृतिक रूप से भारत एक था चोल सेनाओं ने गंगा पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में ही एक नये नगर की स्थापना कर दी । वह समय ही दूसरा था राजा का कर्तव्य अपनी प्रजा और अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा तक सीमित था जिसके लिए वे पूरी बहादुरी से लड़ते थे , साका करते थे जौहर होते थे पर राष्ट्र का कॉनसेप्ट दिमाग़ में ही नहीं था ।

मराठे अनेक राजाओं को पराजित करके चौथ टैक्स वसूलते थे । जब प्लासी मे जंग हुई उस समय भी बंगाल का नवाब मराठों को चौथ देता था लेकिन वे नवाब की मदद में नहीं आये । पूरे देश में यही चल रहा था । लिहाज़ा अंग्रेजों के लिए एकदम खुला मैदान मिल गया ।

जब भारत में राष्ट्रवाद का जन्म हुआ, अंग्रेजों के विरूद्ध एक जन आंदोलन हुआ तब जनता के हृदय में राष्ट्रवाद का अंकुर फूटा और देखते देखते एक क्रांति घटित हो गई ।

यह राष्ट्रवाद कैसे आया इस पर चर्चा जारी रहेगी ।

साभार:राजकमल गोस्वामी-(ये लेखक के अपने विचार है)

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