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सारे वामी बमबमा के भड़के हैं पीयूष मिश्रा पर।

Sarvesh Kumar Tiwari

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Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
सारे वामी बमबमा के भड़के हैं पीयूष मिश्रा पर। दो दिन में फेसबुक ट्विटर पर हजारों पोस्ट लिखे गए हैं बेचारे पीयूष मिश्रा पर… एक झटके में वे घटिया गायक, घटिया अभिनेता, बेकार रचनाकार हो गए हैं। और पीयूष का अपराध क्या है? तो साहेबान, पीयूष का अपराध यह है कि उन्होंने वामियों के बड़े भाई, जिल्लेइलाही, शोले फिलिम के हरिराम नाई, ओस्तादों के ओस्ताद, बौद्धिक मवाद, मरे हुए गधे की सड़ी हुई पाद, हमदर्द ए फिलिस्तीन, शान ए पाकिस्तान, नफरती बू वाली मोहब्बत की दुकान, श्रीमान नसीरुद्दीन शाह से सवाल पूछ दिया। कुल मिला कर बात यह कि एक सवाल पूछते ही पीयूष मिश्रा नकारा घोषित हो गए है।

दरअसल वामपंथ मानता है कि किसी गैर वामपंथी को सवाल पूछने का हक नहीं है। और किसी गैर वामी ने गलती से भी किसी वामी से सवाल पूछ दिया, फिर तो उसपर मार्क्स निंदा का केस चलना चाहिए। वह तो भला हो इस देश की जनता का जिसने इनके हाथ से सत्ता छीन ली, वरना ये तो गैर वामियों पर जजिया कर लगवा देते।

इनकी मानें तो मैट्रिक में तीन बार फेल हुआ युवक माथे पर वामी ठप्पा लगवा ले तो वह सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से सवाल पूछ सकता है, पर किसी वामी नचनिया से सवाल पूछने का अधिकार किसी के पास नहीं। इनके अनुसार यही समानता है, यही साम्य है…

खैर। अब बात कर लेते हैं वामियों द्वारा घोषित सबसे शानदार एक्टर नसीरुद्दीन शाह की। उनके अभिनय का जलवा यह है कि आज तक केवल उनको लेकर बनाई गई किसी फिल्म ने अपना बजट नहीं निकाला होगा। इनकी फिल्में क्लोज सर्कल वालों के लिए बनती रही हैं। वे ही देखते रहे, बड़ाई करते रहे, महान बताते रहे। बॉक्स ऑफिस का रिपोर्ट देखें तो सबके आगे फ्लॉप का ठप्पा मिलेगा… ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी के कुछ “तीन सौ क्लब” वाले महानतम साहित्यकारों की किताबें क्लोज सर्कल वालों के लिए छपती हैं। वे ही लिखते हैं, वे ही पढ़ते हैं, वे ही चर्चा करते और कालजयी घोषित करते हैं। बाकी सामान्य पाठक उन किताबों का नाम भी नहीं जानते…

वामी लेखकों की मानें तो नसीर साहब आम जनता के लिए अभिनय नहीं करते। आम जनता की क्या सामर्थ्य जो उनके अभिनय की बारीकियां समझ सके? आमता बचन, सारू खान, अजे देगन, रजेश खाना तो फालतू में सुपर स्टार कहलाए हैं। उनको पसंद करने वाले तो बुड़बक हैं, गंवार हैं। वे क्या जानें अभिनय का ताल तमूरा? असली अभिनय वही है जो आम जनता को बकवास लगे… असली हीरो वह है जिसकी फिल्म फ्लॉप हो। असली गायक वह है जिसे कोई न सुने। असली लेखक वह जिसे गधे भी न पढ़ें। और असली क्रांतिकारी वह, जिसे उसके माता पिता भी बात न करते हों…

खैर… इनकी बिलबिलाहट अच्छी लग रही है। पियूष मिश्रा ने सही पलीते में आग लगाई है।

Courtesy: Sarvesh Kumar Tiwari (The views expressed solely belong to writer only)

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