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किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तानीयों का समर्थन क्यों

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Positive India:Suresh Mistry:
कुछ आक्रोशित मित्र बन्धु,भगिनियों का मत है कि एहसान फरामोश खालिस्तान समर्थक… ( समग्र सिख समाज नहीं ) गुरुओ का इतिहास भूल गए हे और हिंदू विरोधी बन गए हे…

जी नहीं…

भूले कुछ नहीं है भाईयो बहनों, बस समझौता कर लिया है….

वह होता है ना “म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग फॉर कॉमन वार अगेंस्ट कॉमन एनेमी जैसा…”

बड़े विरोधी को निपटाने के लिए दो समान छोटे मोटे विरोधी एक हो जाए और काफ़िर हिंदू को निपटा के फिर आपस में देखते रहेंगे….!!

यह वही करार है जो जिहादी और कम्युनिस्ट के बीच है वैश्विक स्तर पर बर्षो से….

देखा नहीं उइगर को सुव्वार खिलाते चीन के खिलाफ भी कोई जिहादी चूं तक करता है अभी…?

क्यों की अभी दोनों की म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग है…

ठीक यह आम करार खालिस्तानी चिल्लियों और जिहादियों की है।

भीम मीम की जुगल बंदी वाला जुगाड भी इसी तर्ज पर है….

बस उन्हें अलग देश का झांसा नहीं दे सकते इस लिए साथ साथ आबाद होने की लोलीपोप दे रखी है… ठीक जेसे पाकिस्तान में दलित आबाद हुए जोगेश्चर मंडल के साथ लाखो की तादाद में जाकर…

इन शॉट आज यह हिंदू से निपटने के लिए अलग अलग गठबंधन में भाई भाई बने है…. खालसा मीम, भीम मीम, वामपंथी मीम इत्यादि इत्यादि…

और हां आगे एक दूसरे से निपट लेंगे यह स्ट्रेटजी क्लियर है

पहले हिंदू से निपट हिंदुस्तान हथिया लेे…

और ऐसे प्रत्यक्ष गठबंधन वर्षों से चल रहे है ठीक हमारी आंखों के सामने पर हम हिन्दू है कि धर्मयुद्ध में युद्धकाल से ही इनकार करते बैठे है वर्षों से…ठीक उस कबूतर की तरह जो बिल्ली की आमद पर आंख बंद कर खुद को सुरक्षित मान लेता है…

साभार:✍️सुरेश(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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