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कामसूत्र क्या सिर्फ प्रेम और कामवासना को समझने के लिए लिखी गई थी?

-संदीप तिवारी "राज" की कलम से-

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Positive India:Sandeep Tiwari”Raj”:
कामसूत्र भारत में लगभग 300 भाषा में लिखी गयी…उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए…कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा की बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है…प्रेम के स्वरुप का वर्णन है…वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी…ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक है…!!

भारत किसलिए अलग था अन्य देशों से ? संभवतः इसीलिए…क्यूंकि भारत जिस मानसिक खुलेपन की बात उस समय कर रहा था वो शायद ही किसी सभ्यता ने की थी…मगर धीरे-धीरे विदेशी प्रभावों से यहाँ की मानसिकता दूषित हो गयी…खजुराहो के मंदिर इस्लाम के आने के कुछ ही सौ साल बाद बने…ये बताता है कि उस वक़्त तक यहाँ अपनी संस्कृति और समझ को स्वीकार करने की हिम्मत थी…यहाँ तक कि भारत की पूजा पद्धति में अभी तक नग्नता पूजनीय है…जीवन की उत्पत्ति के अंग पूजनीय स्वीकार किये गए हैं मगर आज वही पूजने वाले शर्माते हैं अगर कोई उनसे सवाल करे तो वो लिंग और योनी के दार्शनिक पहलू समझाने लगते हैं…ये बताता है कि भीतर से उन्हें ये स्वीकार्य नहीं है…विदेशी प्रभावों द्वारा ये अपनी परंपरा से शर्मिंदा हैं…बस परंपरा निभा रहे हैं किसी तरह…!!

बैन (निषेध) तो भारत ने शायद ही किसी चीज़ पर लगाया हो…खासकर जहाँ प्रेम की बात आये वहां तो ये संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से एक असंभव बात लगती है… निषेध की मानसिकता इस्लामिक मानसिकता है…शराब लोग ज्यादा पियें तो शराब बंद कर दो…काम (सेक्स) निषेध कर दो…साथ घूमना…गले में हाथ डालना…आलिंगन करना…ये सब निषेध है इस्लामिक मानसिकता में…भारत का इससे कोई लेना देना नहीं है…मगर चूँकि उनसे नफरत करते करते हमने कब उनकी चीज़ें ओढ़ लीं ये पता ही न चल पाया…साधू और साध्वी हमे जो ब्रहमचारी हों वो अधिक भाने लगे…इस्लाम के तरह ही जो हर चीज़ के निषेध की बात करता हो उसे हम सर आखों पर बिठाने लगे…!!

सोचिये अगर तालिबान को कामसूत्र दे दी गयी होती पढने को…और ये कहा गया होता कि ये बिलकुल भी निषेध नहीं है…जैसे जीना चाहते हो वैसे जियो…प्रेम तुम्हे किसी से भी हो सकता है और अल्लाह तुम्हारे प्रेम पर पहरा नहीं लगा रहा है…तो क्या उन्हें किसी हूर की चाहत होती कभी…?? यूरोप के लोग क्यूँ नहीं मरते हैं हूर की चाहत में ? वो क्यूँ नहीं शराब की नदियों के लिए जन्नत की कल्पना करते हैं..?? क्यूंकि उनके लिए ये निरी बेवकूफी भरी बातें हैं…उनके डिस्को में हूरों की कमी नहीं है…और ऐसा नहीं है कि वो उनसे रेप कर रहे हों…मर्ज़ी का सौदा होता है प्रेम का वहां…शराब उनके यहाँ अथाह है और हर तरह की है…उन्हें किसी जन्नत की ज़रूरत नहीं है शराब पीने के लिए…उन्होंने अपने देश को ही जन्नत बना रखा है…और इसीलिए हर मुल्क का हर नागरिक अमेरिका में रहने के सपने देखता है…क्या है अमेरिका में…?? वहां कुछ नहीं है बस आपके जन्नत की कल्पना को धरती पर साकार कर दिया है उन्होंने…वहां वो खुलापन है जो कभी भारत में था…इसीलिए आप मरते हैं वहां जाने के लिए…!!

भारत अमेरिका हो सकता था…और अभी भी हो सकता है…अगर किसी चीज़ की ज़रूरत है हमें तो वो है सख्त कानून और मानवाधिकार…बाक़ी किसी भी चीज़ पर बैन लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है…और वैसे भी ये निषेध हमारी संस्कृति के ही विरुद्ध है…और प्रेम पर बैन तो ये बताता है कि आपको अपने धर्म की रत्ती भर समझ नहीं है…आप के भीतर सिर्फ इस्लाम की कुंठा भर गयी है बस…!!

निषेध लोगों को जीवन विरोधी बना देता है… उन्हें कुंठित कर देता है…जिन नौजवानों को स्त्री/पुरुष से प्रेम करना है उन्हें आप गाय से प्रेम करना सिखा रहे हैं और जिन्हें इस जीवन में कामसूत्र पढ़नी चाहिए उन्हें आप हूरों के सपने दिखा रहे हैं…और ऐसा करके आप सुसाईड बॉम्बर पैदा कर रहे हैं…एक की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी है और वो इस निषेध से तंग आकर अब हूरों से मिलने को लालायित हैं और दूसरे बस तैयारी कर रहे हैं…ये बहुत धीरे धीरे होता है मगर आज नहीं तो कल आप उन्हें भी यही समझाने में सफल हो जायेंगे कि कहाँ इन गंदे मांस के लोथड़ों के पीछे पड़े हो…वहां स्वर्ग की अप्सराओं का सोचो…और शराब यहाँ नहीं वहां स्वर्ग में मिलेगी भरपूर…यहाँ बस तुम लट्ठ ले कर जैसा हम कहते हैं वैसा करते रहो बस…!!!

साभार:संदीप तिवारी “राज”-(ये लेखक के अपने विचार है)

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