
न्यू फाइनेंशियल ईयर में “नॉमिनल जीडीपी” और “रियल जीडीपी” को समझने की आवश्यकता है
-किशोर बर्डिया की कलम से-

Positive India:Kishore Baradia:
आज के समय में किसी भी देश की तरक्की को समझने के लिए सबसे ज्यादा जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) को देखा जाता है। अक्सर हम सुनते हैं कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और जल्द ही 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने वाला है। ये बातें सुनकर अच्छा लगता है और देश के प्रति भरोसा भी बढ़ता है।
लेकिन जब एक आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी देखता है, तो तस्वीर थोड़ी अलग लगती है। बाजार में सामान महंगा हो रहा है, बच्चों की स्कूल फीस हर साल बढ़ रही है, किराया और दवाइयों का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर देश इतना तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो आम आदमी को इसका फायदा क्यों नहीं दिख रहा?
यहीं से “बेस ईयर” यानी आधार वर्ष की बात समझना जरूरी हो जाता है। बेस ईयर एक ऐसा साल होता है, जिसके आधार पर हम आज की अर्थव्यवस्था की तुलना करते हैं।
इसे आसान उदाहरण से समझें—अगर कोई व्यक्ति हर साल अपनी लंबाई नापे, लेकिन हर बार अलग-अलग पैमाना इस्तेमाल करे, तो उसे सही पता नहीं चलेगा कि उसकी लंबाई बढ़ रही है या नहीं। ठीक वैसे ही, अगर अर्थव्यवस्था को मापने का आधार पुराना या बदलता रहे, तो सही विकास समझना मुश्किल हो जाता है।
अभी भारत में जीडीपी मापने का आधार वर्ष 2011-12 है। यानी आज की अर्थव्यवस्था की तुलना 2011 की कीमतों से की जा रही है। इतने सालों में देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आ चुका है—डिजिटल कारोबार बढ़ा है, नए स्टार्टअप आए हैं, और सेवा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ा है। लेकिन पुराना आधार वर्ष इन बदलावों को पूरी तरह नहीं दिखा पाता।
इसी वजह से “नॉमिनल जीडीपी” और “रियल जीडीपी” जैसे शब्द आते हैं। नॉमिनल जीडीपी में महंगाई भी शामिल होती है, जबकि रियल जीडीपी असली विकास को दिखाती है, यानी महंगाई को हटाकर। इसलिए असली स्थिति समझने के लिए रियल जीडीपी ज्यादा जरूरी होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेस ईयर को हर 5 साल में बदलना चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था में हुए बदलाव सही तरीके से दिख सकें। लेकिन भारत में बेस ईयर लगभग 14 साल पुराना हो चुका है, जो एक चिंता की बात है।
अगर हम पुराने आंकड़ों के आधार पर फैसले लेंगे, तो नीतियां भी सही नहीं बनेंगी। बैंक और सरकार जब ब्याज दर या अन्य आर्थिक फैसले लेते हैं, तो वे इन्हीं आंकड़ों पर निर्भर रहते हैं। इसलिए सही और अपडेटेड डेटा बहुत जरूरी है।
कोविड-19 के समय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा था। उस दौरान “बेस इफेक्ट” के कारण विकास दर कुछ समय के लिए ज्यादा दिखने लगी, जो पूरी तरह वास्तविक नहीं थी। अब जब स्थिति सामान्य हो रही है, तो नया बेस ईयर तय करना और भी जरूरी हो गया है।
एक और समस्या यह है कि भारत में आर्थिक आंकड़े कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। इससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ये आंकड़े पूरे देश के होते हैं, किसी एक सरकार के नहीं। इसलिए इन्हें पूरी पारदर्शिता और स्वतंत्रता के साथ तैयार किया जाना चाहिए।
बेस ईयर बदलना सिर्फ एक तकनीकी काम नहीं है, बल्कि यह ऐसा है जैसे हम अपने सामने लगे दर्पण को साफ कर रहे हों। जब दर्पण साफ होगा, तभी हमें अपनी असली स्थिति साफ-साफ दिखाई देगी।
आज 2026 में बैठकर 2011 के आधार पर अर्थव्यवस्था को समझना ऐसा ही है, जैसे पुराने मेडिकल रिकॉर्ड से आज की बीमारी का इलाज करना।
इसलिए समय की मांग है कि भारत अपनी आर्थिक गणना प्रणाली को अपडेट करे। जब बेस ईयर सही होगा, तभी विकास की सही और स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।