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काबुल नदी का जल भारत के टुकड़े कर देने वालों के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है।

-विशाल झा की कलम से-

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Positive India:
काबुल नदी का जो जल अफगानिस्तान की एक बालिका ने भेजा है वह जल दरअसल भारत की सांस्कृतिक अखंडता का संदेश है।

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भारत के टुकड़े कर देने वालों के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। भारत के भौगोलिक टुकड़े कर देने के बावजूद भगवान श्री राम को अर्पित करने के लिए काबुल नदी का जल आना सांस्कृतिक अखंडता का द्योतक है।

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यही सांस्कृतिक अखंडता एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है। भारत में सांस्कृतिक विविधता का नाम लेकर भारत के टुकड़े टुकड़े कर देने का जो ख्वाब रचा जा रहा है, जो नारे गढ़े जा रहे हैं उन्हें पहले अफगानिस्तान के इस बालिका को जवाब देना चाहिए।

अखंड राष्ट्र की अस्मिता के संकल्प पर भारत में जो राष्ट्रवाद की प्रचंड लहार है, वामपंथी इसे तानाशाही शासन के स्वरूप में जबरन नैरेट करने की कोशिश करते हैं। ताकि भारत को सांस्कृतिक विविधता के नाम पर जितनी संस्कृति उतने टुकड़े अर्थात भारत के टुकड़े टुकड़े वाले सिद्धांत का मजबूतीकरण किया जा सके।

हिटलर के तानाशाही शासन और भारत में राष्ट्रवाद के लोकतांत्रिक शासन दोनों को वामपंथी बार-बार तुलना करते रहते हैं। लेकिन बौद्धिक वामपंथियों के पास उस बालिका के लिए कोई जवाब नहीं है जिसने अयोध्या से 1500 किलोमीटर दूर होने के बावजूद भगवान श्री राम को अर्पित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को काबुल नदी का जल भेजा। जिसे आज श्री योगी आदित्यनाथ जी ने गर्भगृह को अर्पित किया।

एक भारत मजबूत भारत के संकल्प का वामपंथी वैचारिक दानव शिकार ना करेंगे इसे सुनिश्चित करने के तौर पर मैं इस पूरे पुण्यकर्म को देखता हूं। ना जान पहचान होते हुए भी राष्ट्र के एक नागरिक के तौर पर काबुल की उस बालिका का स्वयं को ऋणी मानता हूं। आभार प्रकट करता हूं। जय सियाराम।

विशाल झा

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