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अंग्रेजी का लेप लगाए एक नकली आदमी प्रणव रॉय

-हितेन्द्र पटेल की कलम से-

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Positive India:Hitendra Patel:
प्रचार केवल नेता या अभिनेता अभिनेत्री का नहीं होता है । स्टार पत्रकार का भी होता है ।

देखिए कैसे दिग्भ्रमित किया जाता है । प्रणय राय बहुत ही संपन्न बैकग्राउंड से आते हैं । सुपरएलीट ।

सुपरएलीट कोई भी बिना यूरोपियन बने नहीं बन सकता । एलीट वही जो अंग्रेज़ हो , या अंग्रेज़ जैसा हो ।

ऐसा बनने के लिए चमड़ी नहीं हो तो भाषा तो है ।अंग्रेजी का लेप चाहिए ट्राइबल भी कामचलाऊ अंग्रेज़ बन जाता है ।

सामान्य किस्म के अकादमिक थे जब चुनाव के दौरान विश्लेषण करने आए । छा गए । पुराने लोग याद कर सकते हैं कि उनके साथ एक चुस्त हिंदी का आदमी था जिसका नाम था विनोद दुआ । अंग्रेजी राज को स्वाधीन भारत में ऐसी ही व्यवस्था चाहिए थी : अंग्रेजी ऊपर हो और उसकी अंग्रेजी नुमा कसावट के साथ पीछे पीछे हिंदी चले ।

प्रणव राय का उत्थान नक़ली था जिसे राज्याश्रय प्राप्त था । खूब था । सुधीश पचौरी ने इस तरह की लूट पर लिखा था।

लेकिन समय बदलता है । राजदीप सरदेसाई और अर्नब गोस्वामी जैसे लोग आ जुड़े थे पर वे कोई कम रहेंगे इस खेल में । वे भी बड़े लोगों के परिवार से आए थे । सत्ता के गलियारे में उनकी भी पैठ हो गई और उनकी गाड़ी भी चल निकली ।

देखते देखते यह नक़ली बादशाह मीडिया के मायावी खेल में पिछड़ गया ।

बहुत सिंपल मामला है ।

अब ऊँच नीच में सत्ता इधर से उधर हो गई और पुराने सितारे सेट नहीं हुए । अब इस तरह के लोग गेम में फिट नहीं थे ।

जो नई सत्ता में आए वे उल्टी खोपड़ी के लोग थे । वे इनसे तालमेल में नहीं रहे और हमलावर हो गए । सितारों की रौशनी मद्धिम हो गई ।

अर्नब चालाक निकले । चिल्लाने में वे उस्ताद थे । उन्होंने सेटिंग कर ली । पीछे से आकर रजत शर्मा भी एक चैनल चला ले गए आगे ।

कालक्रम में ये साहब की भिड़ंत हो गई नई सत्ता के लोगों से ।

ये लोग बदमाश थे और पुराने सोफिस्टीकेटेड लोगों का लिहाज़ नहीं करते थे। ये नेहरु जैसे समझदार नहीं थे ।

अब ये लीजेंडरी मीडिया मैन को सहानुभूति देने के लिए पूरा कैंपेन किया जा रहा है । और हमलोगों को उनको महान मानने के लिए प्रेरित किया जा रहा है ।

ये चालाकी ठीक नहीं । इसी चालाकी को समझने के बाद आप समझ जाएँगे कि अरुंधति राय क्यों महाश्वेता देवी से कमतर हैं । ( कोई उनकी अंग्रेजी से मोहित होकर उनको देवी बनाने में लगा रहे तो उनको इस तरह के वाक्य ब्लासफ़ेमी से कम नहीं लगेगा ।)

इस ट्रैप में न फँसें ।

आयकन मत बनाएं । अच्छी अंग्रेज़ी में बोलने की शैली प्रभावशाली थी और ये कुछ अच्छे लोगों को लेकर अच्छे शो करते थे । एकदम प्रोफेशनल । लालू प्रसाद यादव के साथ बातचीत में भी अंग्रेजी से नीचे नहीं उतरते थे ।

पुराने एलीट मूल्यों के साथ अब भी हैं । मैं उनको सुनता हूँ । लेकिन उनको कभी बड़ा पत्रकार नहीं मान पाया ।

एकबार राजेन्द्र माथुर इनके स्टूडियो में उनसे बात कर रहे थे । उस सेट अप में ये नेहरु थे और राजेंद्र माथुर जैसा सचमुच का बड़ा पत्रकार उनका कोई रीजनल समझदार आदमी ।

मेरी बात को चेक करने के लिए आप इनके द्वारा अंग्रेजी में लाए गए लोगों के बैकग्राउंड को चेक कीजिए ।

हिंदी में ये उदार थे । होना ही था । यह बात दीगर है कि एक समय रवीश कुमार की मार्केट वैल्यू इनसे ज़्यादा होने लगी ।

अभी इतना ही ।

Courtesy:Hitendra Patel-(The views expressed solely belong to writer only)

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