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जेएनयू से ब्राह्मणों के विरोध में उठा सुर एक विमर्श के रूप में क्यो स्थापित हो गया है ?

-विशाल झा की कलम से-

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Positive India:Vishal Jha:
भारत में तमाम तरह के विरोध होते हैं। सत्ता विरोध, संस्कृति विरोध, राष्ट्र विरोध, हिंदुत्व विरोध ये सारे विरोध भारत के वैचारिक वातावरण में हलचल पैदा कर देते हैं। विमर्श के नाम पर आवेश भरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी मिलती है। लेकिन जब बात ब्राह्मण विरोध का होता है, तो आश्चर्य है एक अलग ही विमर्श पैदा होती है। ना कोई नोकझोंक, ना कोई तनाव, ना ही प्रतिक्रिया देने में कोई जल्दीबाजी। कोई आवेश नहीं, बिल्कुल शालीन भाव का विमर्श। सुंदर विमर्श का एक प्रकार से प्रतिमान स्थापित हो जाता है। वैचारिक किंतु विषैले स्तर के विरोध होने के बावजूद लगता भी नहीं कि यह कोई विरोध भी है। ऐसा कि विरोध के सुर में उठा यह विवाद, एक विमर्श के रूप में स्थापित हो जाता है।

दूसरी बात कि विरोध की प्रतिक्रिया में अथवा ब्राह्मणों के समर्थन में मनोज मुंतशिर ने कविताएं पढ़ी। तमाम लोग भी अपने अपने विचार रखें। ब्राह्मणों की उच्चता को एकतरफा अपने विमर्श में रखा। लेकिन राजपूत हों, भूमिहार हों, बनिया हों, लाला हों किसी ने भी इस एकतरफा उच्चता के लिए काउंटर तो दूर, ईर्ष्या तक भी जाहिर नहीं की। उल्टे और आदरभाव ही प्रकट किए। मतलब कटुता का एक गुंजाइश यहां भी खत्म हो गया।

तीसरी और सबसे बड़ी बात कि ब्राह्मण विरोध के काउंटर में यह विवाद दलित बनाम ब्राह्मण के रूप में तो स्थापित हो ही नहीं पा रहा। यह बात इस विरोध की सबसे बड़ी विफलता सिद्ध करती है। उल्टे यह एक ऐसे विमर्श के रूप में स्थापित होता है, जो कहीं ना कहीं इस विरोध के मूल षड्यंत्रकारी वामपंथियों और जिहादियों को उद्भेदित करता है। और हिंदुत्व का अपना विमर्श पूर्व की तरह यथावत बना रहता है।

दलित विमर्श के नाम पर देश विरोधी और संस्कृति विरोधी जो भौतिक शक्तियां भरकर सामने आई, उसका जवाब देने में तो हिंदुत्व की राजनीति ही पर्याप्त सक्षम हो जाता है। उत्तर प्रदेश चुनाव में वषैले चंद्रशेखर रावण को स्थापित करने के लिए कोई कम कोशिश नहीं की गई। बौद्धिक जगत से लेकर अर्बन नक्सल मीडिया के कार्यकर्ताओं तक, लेकिन आखिरकार क्या हुआ? पूरी तरह से हिंदुत्व समाज द्वारा नकार दिया गया। यह नकार कहीं ना कहीं आज के जेएनयू वाले विवाद पर उपजे विमर्श की सफलता का ही परिणाम है।

एक बार को ऐसा आभास हो जाता है जैसे समकालीन राजनीति और समाज के प्राथमिक स्वर्ण युग का हम अनुभव कर रहे हैं। जाति के नाम पर ब्राह्मण विरोध का हम आनंद ले रहे हैं। मतलब जैसे आमंत्रित कर रहे हैं। उस पर अपने विचार रख रहे हैं। कोई जल्दीबाजी नहीं है। कोई राग द्वेष नहीं है। ऐसा विरोध विमर्श तो होना भी चाहिए। और विरोध बाकी जातियों का क्यों होना चाहिए? ब्राह्मण का ही होना चाहिए। विरोध शक्ति का ही होता है। सत्ता का ही होता है। बाकी जातियों का होगा भी क्यों, यह जिम्मेवारी भी ब्राह्मणों की ही होनी चाहिए। ब्राह्मण का विरोध ब्राह्मणों की एक परीक्षा की तरह भी तो है। बौद्धिकता पर कब्जा है तो इसमें बिना आवेशित हुए सफल होना पड़ेगा। शस्त्र उठाए बिना जीतना पड़ेगा। समाज का संरक्षण करना पड़ेगा। हिंदुत्व को राजनीति में निखारना होगा। इस जिम्मेवारी में जब तक ब्राम्हण सफल रहेंगे, तब तक ब्राह्मण ब्राह्मण बने रहेंगे।

साभार:विशाल झा-(ये लेखक के अपने विचार है)

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