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फाइव आइज जैसे ग्लोबल शक्तिशाली एलाइंस ने क्यों भारतीय इंटेलिजेंस के सामने घुटने टेक दिए?

-विशाल जा की कलम से-

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Positive India:Vishal Jha:
फाईव आईज, इससे शक्तिशाली गठबंधन आज के वैश्विक पटल पर और कोई नहीं हो सकता। सूचनाओं का दौर है। जिसके पास जितने अधिक गुणवत्तापूर्ण सूचनाएं हैं वह उतने ही शक्तिशाली। इस गठबंधन में पांच शक्तिशाली देशों के इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं। जिसमें स्वयं कनाडा और अमेरिका भी है। इसके बावजूद कनाडा आज वैश्विक पटल पर लाचार नजर आ रहा है। एलाइंस का सबसे महत्वपूर्ण पार्टनर देश अमेरिका के प्रेसिडेंट का संयुक्त राष्ट्र में बयान, कनाडा के साथ उतनी मजबूती से नजर नहीं आ रहा, जितना भारत की उभरती अर्थव्यवस्था खासकर मिड्लइस्ट इकोनामिक कॉरिडोर के कारण, इसे स्वीकार करता नजर आ रहा है।

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फाइव आइज जैसे ग्लोबल शक्तिशाली एलाइंस के सामने भी भारत का इंटेलिजेंस पूरे आत्मविश्वास से अपना काम कर रहा है। भारतीय इंटेलिजेंस के पास खालिस्तान टेररिज्म को जड़ से खत्म करने के लिए सूचनाओं की कोई कमी नहीं है। कहा जाए तो स्वयं खालिस्तान संगठनों ने सूचनाओं की खेती करके भारतीय इंटेलिजेंस को सूचना उपलब्ध कराया है। जब देश में किसान आंदोलन हो रहा था, तमाम राजनीतिक समझ रखने वालों को किसान आंदोलन में राजनीति नजर आ रही थी। लाल किले पर तिरंगा का अपमान लोगों को देश का अपमान नजर आ रहा था। और इसे मोदी सरकार की नाकामियों की तरह पेश किया जा रहा था। लेकिन मोदी सरकार कभी भी किसी मुद्दे को हाथ भी नहीं लगती, तब तक जब तक कि उसे पूर्णतया खत्म कर देने का कॉन्फिडेंस नहीं मिल जाए। यह पूरा किसान आंदोलन प्रकरण मोदी सरकार के लिए सूचनाओं की वह खेती थी जिसकी पैदावार से आज टेररिज्म के समूल नाश के लिए सरकार पूरी तरह से तैयार हो चुकी है।

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खालिस्तान जैसा मुद्दा न्यूट्रलाइज करना किसी रेडिकल इस्लामिक टेररिज्म को हैंडल करने से ज्यादा चैलेंजिंग है। क्योंकि खालिस्तान जिस पंथ की जमीन पर उगा है, जिस समाज में पोषित हुआ है, उस समाज को भारत की राजनीति में किसी भी कोण से इस्लामी समाज की तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तो इसका संबंध समाज, समुदाय, राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय पटल तक गहरा जुड़ा हुआ है। इसलिए मोदी सरकार हर प्रकार से इस मुद्दे पर क्रैकडाउन के लिए तैयार हो चुकी है, इसके बाद ही सक्रिय नजर आ रही है। अगले महीने 5 अक्टूबर को दिल्ली में आर्थिक, आपराधिक और विधिक तमाम एजेंसियों के साथ इस मुद्दे को खत्म करने के लिए मीटिंग करने जा रही है।

खालिस्तान के खिलाफ क्रैकडाउन में कनाडा को ओपन करना सबसे बड़ा राजनीतिक काम था। लेकिन यह मोदी की रणनीतिक सफलता ही मानी जाएगी कि एक निज्जर की मौत से कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो खुलकर सामने आ गया। खुलकर इतना सामने आ गया कि भारत की तरफ से दिए गए जवाब में जस्टिन को खालिस्तानी आतंकवाद के साथ खड़ा बताने में कोई असुविधा नहीं हुई। कोई मशक्कत नहीं करना पड़ा। लगे हाथ अमेरिका और फाइव आईज के बाकी देश भी किसी भी प्रकार कनाडा के साथ मजबूती से खड़े नजर नहीं आ रहे। अर्थात कनाडा अलग-थलग पर चुका है। ठीक वैसे ही जैसे इस्लामी आतंकवाद को खत्म करने के लिए पहले पाकिस्तान को वैश्विक पटल पर अलग-थलग करना पड़ा था। मोदी की यह रणनीति ही मोदी को फौलादी बनाता है।

अब जब बात सिख समाज की हो, तो सिख समाज वैसे भी भाजपा को इतनी जल्दी मेजोरिटी वोट नहीं देने जा रही। इसीलिए मेजॉरिटी सिख समाज की तरफ से भी कोई शिकायत ना रह जाए, मोदी जी पिछले विधानसभा चुनाव पंजाब के अपने निर्धारित कार्यक्रम में जाते हुए रास्ते से लौट आए थे। उन्होंने यह दिखा दिया था कि कल होकर जब खालिस्तान पर सरकार का क्रैकडाउन होगा, मेजॉरिटी सिख समाज कहीं से भी सहानुभूति बटोरता, छाती पीटता नजर ना आए। खालिस्तान के मुद्दे को समूल नाश करने पर ना मोदी को कुछ मिलने वाला है ना ही भाजपा की राजनीति को। लेकिन इस देश को बहुत बड़ी चीज मिलने वाली है। उस नासूर से सदा के लिए मुक्ति मिलने वाली है, जिसका बीजारोपण इंदिरा गांधी ने किया था।

साभार:विशाल झा-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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