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यह राज कपूर का जन्मशती-वर्ष है।

- सुशोभित की कलम से-

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Positive India:Sushobhit-:
1949 की फिल्म ‘अंदाज़’ का एक दृश्य है जिसमें दिलीप कुमार और राज कपूर का आमना-सामना इस दृश्य में होता है। यह इकलौती फिल्म थी, जिसमें इन दोनों ने एक साथ अभिनय किया। यों वे एक-दूसरे को अरसे से जानते थे और पेशावर के एक ही मोहल्ले से आते थे। दृश्य में देखें, राज कपूर का अभिनय कितना नाटकीय और एनिमिटेड है, उसकी तुलना में दिलीप कितने संयत, धैर्यवान, अंडरटोन्स वाले हैं। फिल्म ‘अंदाज़’ में दिलीप कुमार का आभामण्डल पूरे कथानक पर हावी था।

यह राज कपूर का जन्मशती-वर्ष है। 1940 के दशक के अंत तक हिन्दी सिनेमा में दिलीप कुमार और राज कपूर के अभिनय के स्कूल स्थापित हो चुके थे, जो 1950 के दशक में परवान चढ़े। मैं दिलीप कुमार स्कूल का शैदाई हूँ, यों राज कपूर के महत्त्व से अनभिज्ञ नहीं और उनकी सराहना करता हूँ। राज कपूर एक ड्रामा क्रिएट करना जानते थे, उनकी फिल्मों में सोशल कमेंट्री होती थी। अलबत्ता इसमें ख़्वाज़ा अहमद अब्बास का योगदान अधिक था। वहीं दिलीप कुमार के अभिनय में वैयक्तिकता थी, वे नाकाम प्रेम से टूट चुके युवा के चरित्र से ग्रस्त हो चुके थे। उनके यहाँ समाज नहीं व्यक्ति की स्थापना केंद्र में होती थी। ‘अंदाज़’ में जब ये दोनों आमने-सामने आए तो उनके व्यक्तित्व के इन परस्पर विरोधी गुणों- जो उस समय तक विकसित ही हो रहे थे- के टकराव के कारण फिल्म में एक अनूठी नाटकीयता निर्मित हुई थी, जिसने तब दर्शकों को क़ायल बना दिया था।

दिलीप कुमार और राज कपूर- दोनों एक-दूसरे के पूरक थे और मन ही मन एक-दूसरे को सराहते थे। हालाँकि उनके बीच बड़ी प्र​तिस्पर्धा भी थी। उनके आभामण्डल एक-दूसरे में समाहित नहीं हो सकते थे। इन दोनों का ​हाइब्रिड गुरु दत्त में था। गुरु दत्त के पास वैसा निजी ग्रंथिपूर्ण व्यक्तित्व था, जैसा दिलीप कुमार परदे पर निबाहते थे। यह अकारण नहीं है कि वे ‘प्यासा’ में पहले दिलीप को चाहते थे। वहीं एक निर्देशक के रूप में अपने माध्यम पर उनकी पकड़ और समाज की चिंता राज कपूर की तरह थी। वास्तव में 1951 में आई दोनों फिल्मों ‘आवारा’ (निर्देशक : राज कपूर) और ‘बाज़ी’ (निर्देशक : गुरु दत्त) में बहुत सारी थीमेटिकल समानताएँ हैं। दिलीप, राज और गुरु के इस त्रिक पर पृथक से एक शोध-प्रबंध रचा जाना चाहिए।

फिलहाल तो फिल्म ‘अंदाज़’ के इस दृश्य में राज कपूर के एनिमिटेड अभिनय (आप देख सकते हैं कि शाहरुख़ ख़ान इस शैली से कितने प्रभावित हुए हैं) और दिलीप कुमार के संयत आभामण्डल का निर्मल-आनंद लें।

साभार: सुशोभित-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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