
लव जिहाद के मामलो में अपराधी के साथ साथ पीड़ित समुदाय की लापरवाही
-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

Positive India:Sarvesh Kumar Tiwari:
बिहार के गयाजी में यह लड़का मोमोज का ठेला लगाता था। लगभग एक दर्जन भाई बहनो में सबसे छोटा भाई, नाम रेहान अंसारी । ठेले पर मोमोज खाने लड़कियां भी आती थीं। खबर यह है कि लगभग एक दर्जन लड़कियों को झाँसे में लेकर यौन शोषण करता रहा है। किसी को इंस्टाग्राम से फंसाया, किसी को यूट्यूब से… रील शूट करने की बात, वायरल करा देने की बात… पहाड़ियों में ले जा कर रील शूट करना, फिर जबरदस्ती करना, अश्लील वीडियो बनाना और फिर ब्लैकमेल करने का अंतहीन सिलसिला… इसके इस काम में इसका पूरा परिवार साथ था। सारी की सारी पीड़ित लड़कियां दलित हैं।
इस घटना में कुछ नया है? नहीं। यही अजमेर में हुआ था, जयपुर में हुआ था, पिछले दो चार सालों में ऐसे दर्जनों बड़े मामले उजागर हो चुके हैं। उसके बाद भी ऐसे चिरकुट लड़के अपनी योजना में सफल कैसे हो जा रहे हैं? और क्या इसमें केवल और केवल उन लड़कों का ही अपराध है?
दरअसल अपराधी तो अपराधी है ही, पर एक बड़ा दोषी वह समाज भी है जो बार बार अपने बीच की लड़कियों को ठगे लूटे जाते देख कर भी जागरूक नहीं होता, सतर्क नहीं होता, बल्कि ऐसे मुद्दों पर बात भी नहीं करता।
उनका तो क्लियर है कि हम यही करेंगे। पकड़े जाने से भी कोई भय नहीं। यही लड़का पांच साल जेल में रह जाय तो परिवार को क्या ही फर्क पड़ेगा? उसके आधा दर्जन भाई हैं घर देख संभाल लेने वाले। जेल में भी भोजन पानी मिल ही जाएगा और किसी नौकरी से सस्पेंड डिस्चार्ज होने का भय भी नहीं है। जेल से छूटने पर अगले ही दिन से मोमोज का ठेला भी चालू हो जाएगा। लेकिन जिनकी लड़कियां फंसी हैं उनकी तैयारी क्या थी? उन्होंने किस तरह से बेटी को पाला था कि ऐसा चिरकुट लड़का फंसा ले गया?
आप मानें न मानें, पर अपने देश का सत्य यही है कि एक सामान्य हिन्दू लड़की जब घर से बाहर निकलती है, तभी से वह सैकड़ों के टारगेट में होती है। उसे फंसा लेने के लिए, लूट लेने के लिए सैकड़ों गिद्ध आँखें लग जाती हैं उसके पीछे। लड़की से एक गलती हुई नहीं कि जीवन नरक… तो क्या ऐसे समय में हिन्दू परिवारों को विशेष सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए?
जब शत्रु प्रबल हो, सबकुछ लूट लेने के लिए तत्पर हो, तब तो और अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है। पर तनिक सोचिये तो, क्या उन दलित परिवारों में जिनकी बेंटिया फंसाई गयी हैं, कभी इस विषय पर चर्चा भी हुई होगी? नहीं। वे ही क्यों, किसी के घर में ऐसी चर्चा नहीं होती।
क्या हिन्दू समाज के पास ऐसी कोई व्यवस्था है जहां सामूहिक रूप से ऐसे खतरों पर बात हो सके? ऐसा कोई अवसर है जहां गाँव मोहल्ले के सभी अभिभावक और बच्चे बच्चीयां एक साथ एकत्रित होते और संवाद करते हों? नहीं। फिर कैसे होगी सुरक्षा? तमाम घटनाओं के बाद भी अधिकतम हम जैसे दो चार लोगों के सोशल मिडिया पेज पर ही थोड़ी बहुत चर्चा हो पाती है, इसके अतिरिक्त कहीं कोई बात नहीं। फिर कैसे बचेंगे?
अब लव जिहाद के मामलो में अपराधी के साथ साथ पीड़ित समुदाय की लापरवाही पर भी चर्चा करनी ही होगी।
वैसे एक प्रश्न पूछें? अपने “परत” पढ़ी है? आपको पढ़ना चाहिए।
साभार:सर्वेश कुमार तिवारी-(यह लेखक के अपने विचार हैं)