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विश्व की सबसे सुंदर और परिपूर्ण गाय है थरपारकर जिसने राजपूताना को जीवित रखा

-कुमार एस की कलम से-

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Positive India:Kumar S:
भूगोल का सम्बंध वहां के मानव मानवी के सौंदर्य पर भी पड़ता है।
राजपूताने का पश्चिमी भाग, निचला पंजाब, सिंध का पूर्वी भाग जहां से सरस्वती नदी गुजरती थी और कालांतर में मरुप्रदेश बन गया, वर्षों तक यहाँ अल्प कृषि और बहुल पशुपालन विद्यमान रहा है।
विरल जनसंख्या, विस्तृत घास के मैदान और विषम जलवायु में भी यहाँ लगभग 5000 वर्ष से मानव जीवन के साथ पशुपालन घुलमिल गया।
यहाँ के मनुष्यों में, खासकर आपको वे जातियां जिनमें इंटर ब्रीडिंग नहीं होती, सुंदरता का एक विशेष प्रतिमान नजर आएगा।
पुरूष- सुंदर भव्य ललाट, बड़ी आंखें, सांचे में ढला शरीर, नेचुरल कजरारी भौंहें और लंबी मजबूत भुजाएं। बिना कसरत के भी, सीना तनाहुआ और सिक्सपैकएब्स।
स्त्रियों में लंबा पतला शरीर, बड़ी कजरारी आंखें, लंबे घने केश और बहुत पतली लचीली कमर। सिंधुघाटी की नर्तकी की तरह। शास्त्रों में वर्णित पद्मिनी स्त्रियां। महासती पद्मिनी इसी क्षेत्र की थी।

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इस शारीरिक सौंदर्य की व्याप्ति उत्तरी पंजाब से कच्छ तक और पूर्व में नर्मदा घाटी से पश्चिम में ईरान तक व्याप्त है किंतु केंद्र में जैसलमेर और सारस्वत प्रवाह क्षेत्र ही है।
यहाँ सरस्वती के विलुप्त होने के बाद उसकी स्मृति में एक सारस्वत सत्र नामक यज्ञ हुआ करता था जिसका वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में है। यह 15 से 18 वर्ष चलता था और उसकी दो विधियों में से एक यह थी कि इस क्षेत्र में रहकर आपको गौपालन करना है और जब गायों की संख्या दस गुना हो जाये तो यज्ञ पूरा हो जाता है और उसके बाद जीवन के परमपद की प्राप्ति स्वतः हो जाती है।

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यह गौपालन हिंसक बिल्कुल नहीं होता था बल्कि गाय को सर्वस्व मानकर होता था।
सरस्वती का शांत समृद्ध प्रवाह, औषधीय घास और वैदिक यज्ञों की सुगंध के बीच एक उच्चतम स्तर की जीवन शैली विकसित हुई जिसमें मेधा का चरम था सम्भवतः इसीलिए सरस्वती को विद्या की देवी कहा गया। आज भी इस क्षेत्र में सारस्वत ब्राह्मण पाए जाते हैं।
इन शांत विशाल चरागाहों के बीच बसी सभ्यता में वैसे ही सुंदर बलशाली वैदिक क्षत्रिय विकसित हुए। सैनिक को भट भी कहते हैं। भट से भाटी और साम्यता के लिए शब्द भारती, जिससे भारतीय बना, सरस्वती का भी एक नाम भारती है।

सरस्वती, उसका माहात्म्य अलग विषय है। गौ के प्रति उत्सर्ग और गोचर, चारागाह की परम्परा आज भी विद्यमान है। गोचर, चारागाह के ही साम्य का एक शब्द है – चारण।
चारणों का गौपालन प्रसिद्ध है। इनके घरों में कन्याओं ने देवी के रूप में जन्म लिया, आज भी पूजी जाती हैं। आवड़ जी तो प्रसिद्ध हैं ही, राजपूत कन्याओं में भी मालण बाई, संचियाय इत्यादि भी पूजित हैं जिनका सम्बन्ध परमार वंश से है।

सभी वर्णनों, मूर्तियों और आज भी इन वंशों में जन्मे साधारण जनों का भी सौंदर्य, शारीरिक सौष्ठव, संस्कार, बल, पुरुषार्थ और त्याग के गुण सुरक्षित विद्यमान हैं।
और इसका जो मुख्य कारण है वह मै मानता हूँ यहाँ की #थरपारकर_गाय(#Tharparkar) जो युगों से इनके साथ साथ चलती आयी है। विश्व की सभी गायों में सबसे सुंदर गाय है थरपारकर। सुघड़, सुडौल, बहुत प्यारी, बड़ी सी थुम्बी, विशाल गलकम्बल और कजरारी आंखों वाली।
आप ध्यान से, यहाँ के तरुण कुमारों की आंखों को देखिए और थरपारकर के बछड़े।
अद्भुत साम्यता। न केवल सुंदरता में, स्वभाव, सरलता, सहनशीलता, गजब की साम्यता है।

गायों के विषय में हुए हाल ही के शोध भी यही बताते हैं कि विश्व की सबसे सुंदर और परिपूर्ण गाय है थरपारकर।
सरस्वती तो विलुप्त हो गई पर थरपारकर ने राजपुताना को जीवित रखा।
केवल दूध घी की ही बात नहीं, इसके पास जाकर हाथ फेरिये। बदले में जो वात्सल्य उमड़ता है, इन गायों की आंखों में झांकिए, आप मातृभाव की स्पष्ट अनुभूति देख सकते हैं।
थरपारकर जैसी गाय हो तो इस गाय के लिए एक जीवन तो क्या हजारों जीवन भी बलिदान किये जा सकते हैं।
केवल इस गाय को समझकर, इसका सानिध्य पाकर आप भारत का इतिहास, भूगोल, परम्परा, धर्म और आध्यात्म समझ सकते हैं।(क्रमशः)

#कुमारsचरित(साभार)

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