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कुछ स्त्रियां अपने संध्याकाल में देह के बिना भी प्रेम की परिकल्पना करती हैं

-दयानंद पांडेय की कलम से-

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Positive India: Dayanand Pandey:
कुछ स्त्रियां अपने संध्याकाल में देह के बिना भी प्रेम की परिकल्पना करती हैं । बल्कि अपने इस अमूर्त प्रेम की पैरवी भी करती मिलती हैं । तो क्या यह स्त्रियां मीरा बनने की चाह रखती हैं । लेकिन मीरा तो बचपन से ही कृष्ण जानती है । साक्षात नहीं , मूर्ति जानती है । प्रेम का यह आध्यात्मिक पक्ष है। अलौकिक है यह प्रेम । अगाध है यह ।

इसी लिए रजनीश कहते थे कि मीरा तो एक शराब है । मेरा कहना है कि प्रेम भी एक शराब है । एक नशा है । शाश्वत है । लेकिन देह के बिना प्रेम की परिकल्पना करना प्रेम का पलायन काल है । अपने आप से झूठ बोलना है । जिस को शौक हो बोले । सच यह है कि प्रेम पलायन नहीं जीना सिखाता है । देह भी इस में महत्वपूर्ण फैक्टर है । देह को बिसरा रही स्त्रियों की बात और है । पर देह के बिना प्रेम सोचना अपने आप में प्रेम को खंडित करना है । बिना देह के प्रेम मुकम्मल नहीं होता । भोजन कैसा भी हो , कितना भी स्वादिष्ट हो , देख कर पेट नहीं भरता । देह सामने हो , प्रेम भी हो , आप फिर भी अमूर्त की कल्पना करें तो आप से बड़ा अभागा कोई नहीं है ।

बाकी तुम्हीं हो माता , पिता तुम्हीं हो , तुम्हीं हो बंधु . सखा तुम्हीं हो ! हाथ जोड़ कर गाते रहने में भी कोई बुराई नहीं है । प्रेम इस में भी है । कोई भी गा सकता है । मनाही थोड़े ही है । अपनी-अपनी खुमारी है ।

साभार: दयानंद पांडेय -(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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