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सावरकर को किस बात का बड़ा खेद था ?

- राजकमल गोस्वामी की कलम से-

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Positive India:Rajkamal Goswami:
सावरकर को इस बात का बड़ा खेद था कि मुस्लिम आक्रांताओं ने जब जब विजय प्राप्त की तो उन्होंने हिंदू महिलाओं को बग़दाद की मंडियों में लौंडी बना कर बेचा , उनके साथ हर तरह के दुष्कर्म किये लेकिन जब हिंदू राजा विजयी हुए तब उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के साथ सभ्यता पूर्ण व्यवहार किया और कोई अत्याचार नहीं किया । इसलिए मुस्लिम शासक हिंदू राजाओं की ओर से निश्चिंत रहा करते थे जबकि हिंदू महिलाओं को जौहर करना पड़ता था ।

महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार शत्रु में दहशत उत्पन्न करता है उसके मनोबल को बिलकुल गिरा देता है और शत्रु हृदय से पराजित हो जाता है । जो अपने घर परिवार की स्त्रियों की रक्षा न कर सके उसके जीवित रहने का भी क्या लाभ । भगवद्गीता प्रथम अध्याय के ४१ लें और ४२ लें श्लोक में अर्जुन यही शंका प्रकट करता है कि स्त्रियों के दूषित हो जाने से वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं और कुल जाति सब भ्रष्ट हो जाते हैं , पितरों को तर्पण तक नहीं मिलता ।

शिवाजी के सम्मुख कल्याण के सूबेदार की पुत्रवधू गौहर बानो को पकड़ कर लाया जाता है । वे उसके सौंदर्य की तारीफ़ इन शब्दों में करते हैं कि यदि मेरी माँ तुम्हारी तरह सुंदर होती तो संभवतः मैं भी बहुत सुंदर होता । और अपने सेनानायकों को कड़ी फटकार लगा कर गौहर बानो को ससम्मान वापस कर देते हैं । सावरकर शिवाजी के इस औदार्य से सहमत नहीं है उनका मानना है कि इस सद्व्यवहार से मुस्लिम आक्रांताओं के आचरण में रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला । यदि उनका मौक़ा लगेगा तो वे वहीं करेंगे जो वे सदा से करते आये हैं । वे दुराचार भी करेंगे और इसके लिए शुक्राने की नमाज़ भी पढ़ेंगे कि अल्लाह ने उनके हिस्से में माले ग़नीमत सौंपी ।

सावरकर के तर्क कितने भी सही हों हमारा धर्म हमें वही सिखाता है जो शिवाजी ने किया । द्रोपदियों के चीरहरण का बदला दुःशासनों की छाती फाड़ कर लिया जा सकता है कौरवों की स्त्रियों को दासी बना कर नहीं । राम ने सीता के बदले मंदोदरी का अपहरण नहीं कर लिया । हमारे धर्म के नैतिक मूल्य उनके तथाकथित धर्म से बहुत ऊँचे हैं । और जब हम धर्म की जय हो का नारा लगाते हैं तो इसी धर्म की जय की कामना करते हैं ।

बदले की आग में जल कर हम कभी अपने को हिंदू तालिबानी नहीं बना सकते ।

धर्म की जय हो
अधर्म का नाश हो
प्राणियों में सद्भावना हो
जगत का कल्याण हो

साभार:राजकमल गोस्वामी-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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