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माँ बसे चरणों में तेरे चारों मेरे धाम हैं

-राही की कलम से-

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Positive India:Rajesh Jain Rahi:
माँ बसे चरणों में तेरे, चारों मेरे धाम हैं,
बेर शबरी के यहीं पर और मिलते राम हैं।
है यशोदा की वो झिड़की, नेह में लिपटी हुई,
गोद में तेरी विराजित मुस्कुराते श्याम हैं।

स्वाद मीठी रोटियों का, कम नहीं पकवान से,
आ रही है धूप छनकर एक रोशनदान से।
थाम कर उंगली सिखाया, राह पर चलना मुझे।
आ गया है मुश्किलों में, मोम-सा ढ़लना मुझे।
हो नहीं सकता मैं विचलित सत्य के पथ से कभी,
क्या हुआ संघर्ष है जो,कोशिशें अविराम हैं।
माँ बसे चरणों में तेरे, चारों मेरे धाम हैं,
बेर शबरी के यहीं पर और मिलते राम हैं।

भाव मन के क्या लिखूँ मैं, लेखनी चलती नहीं,
छाँव ममता-सी कहीं भी, दूर तक मिलती नहीं।
बँट गया है भाईचारा, बँट गए चौपाल भी,
माँ नहीं बँटती कभी भी, लाख हो बदहाल भी।
गलतियों को माफ करती, माँ ही दुनिया में सदा,
निष्कपट, निस्वार्थ, निश्चल, श्रेष्ठ सब पैगाम हैं।
माँ बसे चरणों में तेरे, चारों मेरे धाम हैं,
बेर शबरी के यहीं पर और मिलते राम हैं।

खो गया बचपन कहीं पर, लौट कर आता नहीं,
है बहुत रंगीन मंजर, पर मुझे भाता नहीं।
जीतने पर साथ सारे, हारने पर कौन है,
माँ तुम्हीं कुछ बोल दो ना, शेष दुनिया मौन है।
गुम हुई है रोशनी भी, सूर्य को खोजूँ कहाँ,
चाँदनी मुझसे है रूठी, रास्ते गुमनाम हैं।
माँ बसे चरणों में तेरे, चारों मेरे धाम हैं,
बेर शबरी के यहीं पर और मिलते राम हैं।

लेखक:कवि राजेश जैन ‘राही’

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