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गीता कहती है कि संसाररूपी जो वृक्ष है, उसमें मूल ऊपर है, शाखाएँ नीचे हैं!

-सुशोभित की कलम से-

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Positive India: Sushobhit:
गीता के पन्द्रहवें अध्याय के ठीक आरम्भ में एक बड़ा ही विचित्र और रहस्यपूर्ण कथन आता है :

“ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं” (जिसकी जड़ें ऊपर हों और शाखाएँ नीचे- वैसा एक अश्वत्थ यानी पीपल का पेड़!)

क्या अर्थ हो सकता है इस बेबूझ कथन का?

गीता की अनेक टीकाओं में इसे संसाररूपी वृक्ष कहा है। ऊर्ध्वमूल का रूपक तब संसार-वृक्ष के लिए है। वृक्ष जो होते हैं, अगर ध्यान से देखें तो वे बड़ी आश्चर्यकारी संरचना हैं। वे एक स्थावर-प्राणपुंज हैं। जीवन का शिल्प हैं! वे बीजरूप से प्रकट होते हैं, जड़ें धरती में फैलती हैं, फिर धरती के ऊपर तना प्रवृद्ध होता है। शाखा-प्रशाखा, पर्ण-संकुल, पत्र-पुष्प का समारोह प्रस्फुटित होता है। मूल नीचे है, शाखाएँ ऊपर फैलती हैं।

किन्तु गीता कहती है कि संसाररूपी जो वृक्ष है, उसमें मूल ऊपर है, शाखाएँ नीचे हैं!

ठीक यही बात कठोपनिषद् में भी आई है :

“ऊर्ध्वमूलोऽवाक्‍शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः।”

यहाँ भी अश्वत्थ वृक्ष के प्रतीक को ऊर्ध्वमूल की तरह बताया है। जिसे गीता में अव्यय कहा है, उसे यहाँ सनातन कहा है। कि पीपल के उलटे वृक्ष जैसा यह संसार शाश्वत् है, इसका कभी व्यय नहीं होता!

आचार्य शंकर ने गीता का भी भाष्य लिखा है और कठोपनिषद् का भी। कठोपनिषद् के अपने भाष्य में उन्होंने अपनी सुपरिचित रूपकात्मक शैली में “ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख” की नाना दृष्टान्तों के साथ व्याख्या की है और गीता के भाष्य में “ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं” का प्रसंग आने पर ‘श्रुते: च’ कहकर कठोपनिषद् के उस मंत्र का स्मरण कराया है कि श्रुति भी यही प्रमाणित करती है।

शंकर ने ऊर्ध्वमूल की व्याख्या इस तरह से की है कि- “काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महत् होने के कारण अव्यक्त-मायाशक्तियुक्त ब्रह्म सर्वोच्च होने से संसार का मूल है।”

ब्रह्म को मायाशक्तियुक्त बताकर शंकर ने संकेत कर दिया है कि उसकी प्रशाखाओं का विस्तार किस रूप से हुआ है। ‘विवेकचूड़ामणि’ में भी शंकर ने माया को ‘अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति’ कहा था। संसार का वृक्ष माया की शक्ति से अनंत में अपनी प्रशाखाएँ फेंकता है!

जैसे वृक्ष की जड़ें पाताल में होती हैं और वहाँ से वृक्ष का तना फूटकर आकाश की ओर बढ़े चला जाता है, उसके ठीक उलट, जो सर्वोच्च पद है, उस ब्रह्म से संसार की व्युत्पत्ति होती है और उसके बाद शाखाएँ-प्रशाखाएँ नीचे की तरफ़ बढ़ती हैं- वैसा मन्तव्य गीता के इस रहस्यपूर्ण कथन का है।

अर्थात्, संसार का जितना विस्तार है, केंद्र से उतनी ही दूरी है!

और अगर संसार बीजरूप में हो, तो केंद्र में अवस्थित है। वृक्ष तब विलीन हो जावेगा। वृक्ष उत्पन्न ही न होगा।

यही कारण है कि गीता में अन्यत्र धीर-मनुष्य के गुणों का वर्णन करते हुए उसे ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ कहा है। कि वह जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है। क्योंकि आरम्भ में ही मूल से विचलन है। अनारम्भ में स्वभाव में प्रतिष्ठा है। इसीलिए अनारम्भ को कर्म-संन्यास का एक विशिष्ट गुण माना है।

रजनीश ने अपने गीता-भाष्य में इस “ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं” की बड़ी सुंदर और रचनात्मक व्याख्या की है :

“आधुनिक समय के बहुत-से विचारक मानते हैं कि जगत का विकास निम्न से श्रेष्ठ की ओर हो रहा है। कि जैसे-जैसे हम आगे आते हैं, वैसे-वैसे विकास ज़्यादा। इस विचार-सरणी का मूल-स्रोत उद्गम को छोटा मानना और विकास के अंतिम शिखर को श्रेष्ठ मानना है। लेकिन भारत की मनीषा बिलकुल विपरीत है। हम मानते रहे हैं कि मूल श्रेष्ठ है। वह जो स्रोत है, श्रेष्ठ है। अगर विकास की बात सच हो, तो परमात्मा अंत में होगा, प्रथम नहीं हो सकता। लेकिन भारतीय दृष्टि कहती रही है कि परमात्मा प्रथम है। तो जिसे हम संसार कह रहे हैं, वह विकास नहीं बल्कि पतन है। जगत परमात्मा का पतन है। और जगत में विकास का एक ही उपाय है कि यह पतन खो जाए और हम वापस मूल-स्रोत को उपलब्ध हो जाएँ। इसे समझेंगे तो ही उलटे वृक्ष का रूपक समझ में आएगा। कोई उलटा वृक्ष जगत में होता नहीं। यहाँ बीज बोना पड़ता है, तब वृक्ष ऊपर की तरफ़ उठता है। और वृक्ष बीज का विकास है, अभिव्यक्ति है, उसकी चरम प्रसन्नता है। लेकिन गीता ने और उपनिषदों ने जगत को उलटा वृक्ष कहा है। वह परमात्मा का पतन है, विकास नहीं। जैसे वृक्ष ऊपर की ओर बढ़ता है, ऐसे हम संसार में ऊपर की तरफ़ नहीं बढ़ रहे हैं। हम संसार में जितने बढ़ते हैं, उतने नीचे की तरफ बढ़ते हैं। जिसे हम विकास कहते हैं, वह पतन है।”

रजनीश की इस प्रज्ञा के बाद भी भला कुछ कहने को शेष रह जाता है?


Courtesy:Sushobhit-(The views expressed solely belong to the writer only)

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