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Editorial
आस्तीन के सांप खान सर के फन को क्यों कुचलना चाहिए?
इस जेहादी खान सर के हिसाब से किसी नौकरी की न्यूनतम योग्यता से अधिक योग्यता रखने वाले को उस नौकरी के लिए आवेदन ही नहीं करना चाहिए। इसके इस तर्क के अनुसार देश में होनेवाली IAS की परीक्षा की…
10 मार्च के बाद अपनी तुलना चवन्नी से भी करने लायक़ क्यों नहीं रह जाएंगे जयंत चौधरी ?
जयंत चौधरी आप कैराना का पलायन भी भूल गए। क्या सिर्फ़ चवन्नी से अपनी तुलना करने के लिए। अजब है यह भी। और आप भी। खैर , फिकर नॉट ! 10 मार्च को आप को अपने जाट समुदाय के फ़ैसले पर बहुत फ़ख्र होगा।
क्या खान सर को विद्यार्थियों को भड़काने तथा चलती ट्रेन में आग लगवाने का हक है?
खान सर ने हमास जैसे आतंकवादी संगठन को बड़े सॉफ्ट अंदाज से सपोर्ट किया था। तभी मैं उनका एजेंडा पहचान कर विरोध किया था। इजराइल के सामने तो अच्छे-अच्छे मोमिनों की तहजीब निखर आती है। फैजल खान…
मुजफ़्फ़र नगर और कैराना दोनों को बहुत अच्छी तरह क्यों याद है ?
समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच जूतमपैजार शुरु हो गई है। घमासान मच गया है। वीडियो वार हो रहा है। मुसलमान कह रहे हैं कि हम जाटों को सबक़ सिखाएंगे। जाट कह रहे हैं कि हम मुसलामानों को…
दही समझ के चूना क्यों चाट गई तिकड़ी?
आरपीएन सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद स्वामीप्रसाद को यह भी समझ में आ गया है कि उसके लिए पड़रौना से खुद अपना चुनाव जीतना भी लोहे के चने चबाने के समान ही सिद्ध होने जा रहा है। कुल मिला कर…
नेहरू ने 25 साल बाद सुभाष चंद्र बोस के लिए वकालत की अपनी कोट क्यों पहनी ?
नेहरू ने वकालत के नाम पर दिखावा करने की कोशिश क्यों की? गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के हिंसा का हवाला देकर नेहरू को रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? गांधी इरविन समझौता में भगत सिंह को न बचाने के…
क्यों बिछड़े सभी बारी-बारी ??
ज्योतिरादित्य सिंधिया , जितिन प्रसाद और अब आर पी एन सिंह। तो क्या अगला नंबर सचिन पायलट का है ?
सुभाषचन्द्र बोस की प्रतिमा को सम्मान पूर्वक स्थापित कर मोदी ने षड्यंत्रों को कैसे धूल…
6-7 दशक लंबे सुनियोजित सुसंगठित कांग्रेसी षड्यंत्रों की धज्जियां आज उस प्रधानमंत्री ने एकबार फिर उड़ा दीं जिसका जन्म गुजरात के एक छोटे से गांव वडनगर के एक निर्धन विपन्न परिवार में हुआ और…
भारत की चुनावी राजनीति बड़ी दरिद्र राजनीति क्यों है ?
Positive India:Dayanand Pandey:
भारत की चुनावी राजनीति भी बड़ी दरिद्र राजनीति है। वोटर हो , प्रत्याशी हो , पार्टी या मीडिया सब के सब यही हिसाब लगाते हैं कि मुसलमान किसे वोट देगा , दलित किसे…
नेताजी एक मात्र ऐसे शख्सियत हुए जिन्होंने अपने जीवन के साथ-साथ अपना मृत्यु भी बलिदान…
नेता जी को अपार जनसमर्थन आज एक बार फिर भारत के जनमानस में देखने को मिल रही है। जैसे लग रहा है नेताजी की कभी मरे नहीं तो आज भी जीवित ही हैं। उनकी 125 वी जन्म जयंती पर उनको मेरा शत-शत नमन।