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देश की नई राजनैतिक बिसात शाहीन बाग और दिल्ली दंगों का विश्लेषण

देश के राजधानी की रोड पर आंदोलन के नाम से कब्जा।

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Positive India:Dr.Chandrakant Wagh:
दिल्ली मे हुए दंगो की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए । इनके पीछे खड़े राजनीतिक दल और नेताओ के चेहरे बेनकाब होना चाहिए । फिर कई तथाकथित सेक्यूलर नेताओ के चेहरे बेनकाब हो जाऐंगे । अभी एक वर्ग द्वारा अनुराग ठाकुर , प्रवेश वर्मा , कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण की जांच की मांग की जा रही है । यह स्वागत योग्य है । पर क्या इतने से इतना बड़ा दंगा हो गया । जांच की मांग करते हो तो इतना भी साहस होना चाहिए कि सभी की भूमिका की निष्पक्ष जांच के मांग की हिम्मत रखनी चाहिए । पहले मैने बीजेपी के नेताओ की जांच की बात की है ।

अब कांग्रेस के भूमिका की भी बात की जानी चाहिए । कांग्रेस का वह नेता जिसकी वजह से कभी अप्रिय स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना होती होती है; उससे यह पार्टी पल्ला झाड लेती है । पर परोक्ष रूप से और अपरोक्ष रूप से हर समय उनके साथ खड़ी नजर आती है । पाकिस्तान से संजीवनी लेकर आये मणिशंकर अय्यर के शाहीन बाग मे शाहीन तरीके से दिये गये भाषण को जांच के दायरे मे रखना चाहिए । इसके बाद शशि थरूर, जो बाद मे सीएए के समर्थन मे दिखे, उनके भी उदगार पर नजर डालने की आवश्यकता है । पूर्व विदेशमंत्री तथा पूर्व राष्ट्रपति के नाती सलमान खुर्शीद जो एक मुश्किल से तीन साल की बच्ची के आजादी के स्लोगन पर तालिया पीटते नजर आए । उस समय पर्दे के पीछे के बयान को भी नेताओ सहित जांच के घेरे मे रखा जाना चाहिए । इनके सर्वोच्च नेता ने भी सीएए के खिलाफ सड़को मे आने की बात की । अब वो सेक्युलर नेता वारिस पठान, शरजील इमाम, एएमयू का छात्रसंघ अध्यक्ष ,तीस्ता शीतलवाड, अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर , जैसे अनेको नाम है; जिन्होने इस आंदोलन मे अपनी आहूति दी है, सबको जांच के घेरे मे लेने की आवश्यकता है ।

आम आदमी पार्टी के कई नेताओ की जांच होनी चाहिए जो इस आंदोलन के पीछे सदृढता से खड़े थे । आम आदमी पार्टी तो इस आंदोलन मे दो नावो मे सवार थी, और है । जहा अरविंद केजरीवाल ने इस आंदोलन से दूरी बनाई, वही मनीष सिसौदिया ने इस आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन देने की बात की । आम आदमी के पार्षद ताहिर हुसैन तो इस त्योहार के लिए तन मन धन से काफी दिनो से लगे हुए थे; जिसके साक्ष्य उनके घर से चिल्ला चिल्ला कर अपनी गवाही दे रहे है । वही इनके राज्यसभा सांसद संजय सिंह बेशर्मी से उनका बचाव नजर करते आए । दूसरे तरफ मुख्यमंत्री अपने पार्टी के लोगो की संलिप्तता पर दुगनी सजा की बात करते नजर आए ।

कुल मिलाकर शाहीन बाग के आंदोलन को लेकर कोई गंभीर नही था। किसी को भी जनता की या दिल्ली वासियो की नही पड़ी थी । सबके अपने राजनीतिक स्वार्थ थे जो अब दिख रहे है । अब ये लोग सिर्फ घड़ियाली आंसू बहा रहे है ।

इस हमाम मे सब नंगे है । सब लोगो ने जनता के साथ छल किया है । मालूम था अनैतिक मांगे है, पर जान बूझकर समर्थन कर ये दिन लाने की पूरी तैयारी थी । वही प्रशासन और न्यायालय की भूमिका भी काफी निराशाजनक थी । जहां न्यायालय को उनको खाली कराने का आदेश देना था,वहां चार बार के वार्ता के बाद भी वार्ताकार खाली हाथ लौटे । प्रशासन भी राजनीतिक हालात के चलते विगत तिहत्तर दिन से असहाय बनकर खड़ा नजर आ रहा था ।

देश के राजधानी की रोड पर आंदोलन के नाम से कब्जा; देश की सभी इकाई चाहे वो प्रशासन हो या न्यायालय, सभी पंगु नजर आ रहे थे । इससे ज्यादा दुखद स्थिति क्या हो सकती है। धर्म के नाम से राजनीति करने वालो ने इसका गैर वाजिब फायदा बहुत उठाया और अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते रहे और दादी नानी इनके राजनीतिक शतरंज के मोहरे बनते रहे । अब इस देश की राजनैतिक बिसात का नाम ही शाहीन बाग हो गया है, जिसके कहर ने दिल्ली को अपने आंच मे ले लिया है । अभी तक निर्दोष बयालिस लोगो के मारे जाने के बाद भी राजनेताओं की संवेदनाये नही जगी है । हम उस देश मे रह रहे है जहा राजनीति पहले, बाद मे देश आता है, तभी तो ऐसी घटनाये आम है । आगे कभी।

लेखक:डा. चंद्रकांत वाघ(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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