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ये है टीपू का शर्मनाक सच

-सतीश चंद्र मिश्रा की कलम से-

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Positive India:Satish Chandra Mishra:
टीपू का शर्मनाक सच….
टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने “शेर-ए-मैसूर” या “मैसूर का बाघ” कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया….

लेकिन लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी, जहां इंडियन ऑफिस रिकॉर्ड्स में 18वीं शताब्दी की ब्रिटिश-भारतीय संधियों के मूल दस्तावेज़ रखे गए हैं। उसी में श्रीरंगपट्टनम में हुई संधि के पाठ की प्रतियां और संबंधित दस्तावेज़ आज भी सुरक्षित रखे हैं, जो चीख चीख कर यह बताते हैं कि, टीपू सुल्तान कितने निकृष्ट और नीच किस्म का कायर शासक था और देश के गद्दार इतिहासकारों ने कैसे उस कायर टीपू सुल्तान को शेर और बाघ के रूप में महिमामंडित किया।

लगातार तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध को हारने के बाद श्रीरंगपट्टनम की संधि हुई थी। इस संधि के अनुसार टीपू को अपने आधे राज्य का क्षेत्र अंग्रेजों + निज़ाम + मराठों को देना पड़ा था। इसके साथ 3.3 करोड़ रुपये युद्ध में हुई क्षति की पूर्ति के लिए दंड के रूप में जुर्माना भी देना पड़ा था।
इस रकम को देने की गारंटी के लिए टीपू ने पहले अपने दो बड़े पुत्रों को अंग्रेजों के पास गिरवी रखा। लेकिन अंग्रेज़ नहीं माने तो शेष दो पुत्रों को भी अंग्रेजों के पास गिरवी रख दिया।

टीपू सुल्तान के चारों लौंडों के नाम थे…
1.अब्दुल खालिक (उम्र करीब 11 साल)
2.मुईनुद्दीन (उमर करीब 9 साल)
अपने इन दोनों लौंडों को टीपू सुल्तान ने 1792 में अंग्रेजों के पास गिरवी रख दिया था।
शेष दो लौंडों को बाकी की किस्तों की गारंटी के लिए भेजा था उनके नाम थे:
3. मुहीउद्दीन
4. अब्दुल सुल्तान

इस तरह टीपू ने अपने कुल 4 लौंडे (दो-दो करके) अंग्रेजों के पास 1792 से 1794 तक गिरवी रखे।
1794 में टीपू द्वारा जुर्माने की पूरी रकम चुकाने के बाद अंग्रेजों ने उसके चारों पुत्रों को वापस श्रीरंगपट्टनम लौटने दिया था। 1799 में टीपू गुलामी की हालत में ही चौथा युद्ध लड़ते लड़ते मर भी गया था।

ज़रा सोचिए कि, जो व्यक्ति युद्ध में शर्मनाक पराजय के बाद अपनी चार औलादों को अपने दुश्मन के पास गिरवी रख चुका था। उसे आज़ाद भारत में देश के गद्दार इतिहासकारों ने शेर और बाघ बता कर महिमा मंडित किया, बेशर्म कांग्रेसी उसकी जयंती पर नंगे होकर नाचने को बेताब रहते हैं।

साभार: सतीश चंद्र मिश्रा- (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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