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क्या होता अगर सप्ताह में शुक्रवार ना हुआ करता?

-विशाल झा की कलम से-

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Positive India:Vishal Jha:
आज फिर एक शुक्रवार। प्रशासन चिंतित, और चौकस। मीडिया बंधुओं की हांफती आवाजें, कैमरों में थरथराती फुटेज। उन्माद को आतुर दहशत का माहौल। दहशत का शुक्रवार।

दहशत का शुक्रवार से पुराना संबंध है। कभी उन्माद में बदल जाता है तो कभी नरसंहार में। ‘डायरेक्ट एक्शन डे’, 16 अगस्त 1946 शुक्रवार का दिन था। 19 जनवरी 1990, “रलीव, गलीव, व चलीव” के नारों से सहमता और खून होता घाटी, शुक्रवार का ही दिन था। पुराने दिनों में सेना पर होने वाली पत्थरबाजी का दिन, शुक्रवार का ही होता था। ऐसे तो कई शुक्रवार गिनने को इतिहास भी राजी नहीं, मानो थका हुआ महसूस करता हो।

क्या होता अगर सप्ताह में शुक्रवार ना हुआ करता? यह सवाल भारतवर्ष के उन लाखों परिवारों से पूछने पर समझ आएगा, जिसे शुक्रवार सुनते ही आंखों के सामने जिहादी मंजर का इतिहास नजर आने लगता होगा। वह सप्ताह से एक दिन खो देने के कीमत पर भी शुक्रवार के दर्द को भुला देना चाहता होगा।

आज का साधारण शुक्रवार ज्ञानवापी कैंपस में दिखा। 20 लोगों की इजाजत ने 100 की सीमा को लांघते हुए 700 को पार करता हुआ देखा। प्रशासन का लाचार बैरिकेड मानो पहले ही हार चुका हो, कह रहा हो मेरी क्या बिसात जब विभाजन की सीमा भी इस उन्माद के सामने कमजोर पड़ गई हो। प्रशासन के दबाव पर माइक से गुजारिश निकलने लगी कि अब और ज्यादा लोग ज्ञानवापी को ना आएं। लेकिन उन्माद की शक्ल का एक ही लक्ष्य, बहुसंख्यक को ललकार।

कराची-कश्मीर हो या नोआखाली-मोपला, यही शुक्रवार काशी आते थोड़ा ठिठक जाता है। ‘डायरेक्ट एक्शन’ का शुक्रवार तो विश्वमानव गांधी के रहते कमजोर नहीं पड़ा। लेकिन काशी के शासन पर कहा जाता है किसी भगवाधारी का हाथ है। इसलिए दहशत को आतुर शुक्रवार दम तोड़ जाता है। लेकिन क्या यह सदा के लिए संभव है कि आम भारत इस दहशत के शुक्रवार से मुक्त हो पाए?

साभार:विशाल झा-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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