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ये भ्रम कि राहुल गाँधी से जातिगत जनगणना का झुनझुना छीन लिया है, तो बीजेपी स्वयं को ठग रही है

-अजीत भारती की कलम से-

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Positive India:Ajeet Bharti:
बाइट द बुलेट, विचार का समय, स्कोडा-लहसुन
कुछ विद्वान बता रहे हैं कि जब किसी विचार को आप रोक न सको तो उसे अपना लेना ही उचित मार्ग है। इसे ‘बाइटिंग द बुलेट’ कहा जाता है। समझ में नहीं आया, पर सुन कर अच्छा लगा।

तो ‘जातिगत जनगणना’ जैसे विचार का समय आ चुका था और भय यह है कि राहुल गाँधी इसके दम पर जीत जाएगा, इसलिए भाजपा और ‘विकसित भारत’ का अजेंडा लिए घूमने वाले मोदी ने सोचा कि मैं ही कर लेता हूँ।

अब प्रश्न यह है कि जिस राहुल गाँधी ने बीच लोकसभा चुनाव में गारंटी कार्ड बाँट कर आपके कैम्पेन में सेंधमारी की, और आपके ही बूथ वर्कर्स को हवा तक न लगी (या लगी और वो बिक गए), आपको ऐसा क्यों लगता है कि अब आप उसके ‘सरकार तुम्हारी, सिस्टम हमारा’ को काउंटर कर लेंगे?

क्या कल से अभी तक, एक संगठित विपक्ष द्वारा ‘मोदी को नाच नचा दिया’ तथा ‘अब प्राइवेट में भी आरक्षण दो’ के नैरेटिव को आप काटना तो छोड़िए, नोच भी पाए हो? आपके समर्थकों में तीन चौथाई से अधिक को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ‘बाइट द बुलेट’ का आपको लाभ क्या मिलेगा?

राहुल गाँधी, तेजस्वी से ले कर सारा विपक्ष इस बात को आगे बढ़ा रहा है कि सरकार से बाहर रह कर भी वो अपने अजेंडे पर काम करवा ले रहे हैं, तो सोचो सरकार में होंगे तो कितनी तीव्रता से काम होगा।

240 का कारण इन जातियों का पीछे छूटना नहीं था, बल्कि आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष की संघ को ले कर बकलोली, फिर संघ का चुनावी अभियान से हाथ खींचना और यूपी जैसे राज्य में टिकटों का अनुचित आवंटन था।

यदि आज आपको लग रहा है कि विपक्ष विषयविहीन हो गया है और आपने राहुल गाँधी से जातिगत जनगणना का झुनझुना छीन लिया है, तो आप स्वयं को ठग रहे हैं। क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि राहुल गाँधी के पास इसके आगे के मुद्दे नहीं हैं?

उसने कल ही प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कह दिया कि उसकी योजना अब निजी कंपनियों में आरक्षण, संविधान संशोधन से आरक्षण का दायरा बढ़ाने से ले कर भविष्य में कई अन्य बातों को आगे लाना है।

क्या भाजपा को यह लगता है कि वो केवल जातिगत जनगणना पर रुक जाएँगे? जातियों के आँकड़े से कुछ नहीं होता, हर बूथ स्तर तक, हर पार्टी के पास ये आँकड़े पहले से उपलब्ध हैं। आप जिसे सोशल इंजीनियरिंग कह रहे हैं, वो हर पार्टी चुनावों के समय प्रयोग करती है।

समस्या इस आँकड़े के सार्वजनिक हो कर, उसके साथ होने वासी ट्रीटमेंट का है। इस डेटा का होगा क्या? और यदि केवल योजनाएँ बनानी हैं, तो ये चूरन आप खुद फाँकिए क्योंकि दो सौ योजनाएँ चल रही हैं जिसे लोककल्याणकारी योजना कहा जाता है।

दूसरा मशाल ले कर घर के सामने खड़ा हो, तो स्वयं किरासन तेल उझल कर घर को फूँक देना, उसके मशाल की अहमियत समाप्त करना नहीं होता। ये बाइटिंग द बुलेट नहीं है, ये मुँह में नाल रख कर, ट्रिगर दबाने जैसा है।

साभार: अजीत भारती -(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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