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भारत के पहले परखनली शिशु विशेषज्ञ को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी?

-राजकमल गोस्वामी की कलम से-

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Positive India:Rajkamal Goswami:
डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय (१६जनवरी१९३१– १९ जून १९८१)
दोस्त फेल हो जाये तो दुख होता है
दोस्त फर्स्ट आ जाये तो ज़्यादा दुख होता है ।

फिल्म थ्री ईडियट्स का यह संवाद मानव स्वभाव के बहुत अँधेरे कोने में प्रकाश डालता है जहाँ अवचेतन मन में अपने ही लोगों के प्रति स्पर्धा छुपी रहती है । स्वस्थ स्पर्धा अपनी क्षमता में सुधार के लिये प्रेरित करती है किन्तु कब यह स्पर्धा ईर्ष्या में बदल जाती है इसका खुद को पता नहीं लगता । कभी कभी अत्यधिक प्रतिभाशाली सहयोगी के प्रति सहयोगियों में सामूहिक ईर्ष्या विकसित हो जाती है जिसके घातक दुष्परिणाम होते हैं व्यक्तिगत भी और संस्थागत एवं सामाजिक भी ।

डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय पश्चिम बंगाल में एक सरकारी डॉक्टर थे । उन्होंने भारत के पहले परखनली शिशु जो एक कन्या थी को जन्म दिया था । इस कन्या का जन्म दुनिया के प्रथम परखनली शिशु के जन्म के मात्र ६७ दिन के बाद हुआ था । यह पूरी तरह एक स्वतंत्र प्रयोग था । डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय इस खोज के लिये चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार के हकदार थे । दुनिया की हज़ारों लाखों बाँझ महिलाओं के लिये आशा की किरण ले कर आये थे वह ।
अखबारों में यह ख़बर सुर्ख़ियों से छपी और यहीं से दुर्भाग्य की शुरुआत हो गई । सरकार ने जाँच बैठा दी । जाँच दल ने डॉक्टर के दावे की हँसी उड़ाई और उसको सिरे से खारिज कर दिया । भारत सरकार ने उनको अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों मे जाने से रोक लगा दी ।
पशचिम बंगाल सरकार ने उनको हटा कर एक ऐसे सुदूर गाँव में तैनात कर दिया जहाँ रिसर्च की कोई संभावना नहीं बची ।

निराश डाक्टर ने आत्महत्या कर ली । भारत की नौकरशाही लोकशाही और सिस्टम के ऊपर कलंक थी यह आत्महत्या । प्रसिद्ध फिल्मकार तपन सिन्हा ने बाद में इस कथानक पर आधारित एक फिल्म भी बनाई थी ,’ एक डॉक्टर की मौत’

यूँ ही करन जौहर के सरोगेट पिता बनने पर मुझे यह दुखभरी गाथा याद आ गई ।

साभार:राजकमल गोस्वामी-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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