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जब जावेद अख़्तर ने मुफ़्ती नाम के किसी ख़ुदा के नुमाइंदे से बहस की

-सुशोभित की कलम से-

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Positive India: Sushobhit:
क्या ख़ुदा का वजूद है- ये सवाल ही नहीं है। ख़ुदा का तसव्वुर लोगों के दिमाग़ में कैसे आया- ये सवाल है। ये फितूर कहाँ से आया, क्यों आया, किसने पैदा किया- ये सवाल है। ख़ुदा- जैसा कि लोग बयान करते हैं- उसका कोई वजूद नहीं है, ये तो बहुत पहले ही तै हो चुका। नीत्शे और रसेल से लेकर डॉकिन्स तक आलिमों की पूरी फ़ौज है।

जावेद अख़्तर साहब ने मुफ़्ती नाम के किसी ख़ुदा के नुमाइंदे से बहस की और हम एथीस्टों की दलीलें सामने रखीं। पूरी बहस मैंने सुनी नहीं, और सच कहूँ तो सुनने की ज़रूरत भी नहीं, क्योंकि मुझको अच्छी तरह से मालूम है कि गॉड, ईश्वर और ख़ुदा के नुमाइंदे किस तरह की बातें करते हैं। हम एथीस्टों और इन बिलीवर्स में सबसे बड़ा फ़र्क़ ये है कि हम अपना दिमाग़ खुला रखते हैं और ये कहने की हिम्मत दिखाते हैं कि यूनिवर्स की फ़ंक्शनिंग हमारी समझ से परे की चीज़ है और हमें इसके बारे में बहुत कुछ मालूम नहीं है। जबकि बिलीवर लोग पहले ही एक नतीजे पर पहुँच चुके होते हैं। मज़े की बात ये है कि इनका नतीजा वही होता है, जो उनके घर-परिवार, समाज-मज़हब का होता है। कोई बिलीवर दूसरों के गॉड्स में नहीं, पैदाइश से मिल गए अपने ही गॉड में यक़ीन करता है। मसलन, मुसलमान ये नहीं मानता कि ब्रह्मा ने दुनिया बनाई, ये मानता है कि अल्लाह ने दुनिया बनाई। अगर वो सच में ही बिलीवर होता तो ख़ुदा के तमाम तसव्वुरों को स्वीकार करता। जैसे आसमान दुनिया के हर कोने में आसमान ही होता है, सीसे की कनात नहीं बन जाता, लेकिन ख़ुदा बदलता रहता है।

बात किसी ख़ुदा को मान लेने तक होती तो भी ठीक थी, लेकिन ये केवल ख़ुदा से ही वास्ता नहीं रखते, ख़ुदा के नाम पर ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन की जो तमाम बुराइयाँ है, जिसके नियम-क़ायदे, उसूल-रसूल, किताब-हिजाब (ये शब्दावली इस्लामिक मालूम होती है, लेकिन इसे दुनिया के तमाम रिलीजन्स के लिए लागू समझें) सब तै होते हैं। बात ख़ुदा के तसव्वुर की थी और ये लोग ख़ुदा के लबादे से पूरे का पूरा मज़हब निकाल लाते हैं।

हुआ ये कि हाल ही में मेरी एक बिलीवर से ख़ूब बहस हुई। संयोग से वो भी मुसलमान थे। उन्होंने ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, लेकिन ख़ुदा की जूँ मेरे कानों पर रेंगा नहीं पाए। उन्होंने वही घिसी-पिटी दलीलें दीं कि ख़ुदा नहीं है तो क़ायनात कैसे बन गई। मैंने कहा- भाईजान, मुझको भी नहीं मालूम कि कैसे बनी, आओ मिलकर पता लगाते हैं, लेकिन ख़ुदा के लिए इस नतीजे पर मत पहुँच जाओ कि ख़ुदा ने बनाई है और ना केवल बनाई है, वो उसके रोज़मर्रा के मामले में दिलचस्पी भी रखता है। जी हाँ, किससे शादी करनी है किससे नहीं, क्या खाना-पहनना है क्या नहीं, कौन औरत बेवफ़ा है कौन नहीं, कौन-सी जंग लड़नी है कौन-सी नहीं, ये तमाम हिदायतें ख़ुदा देता है। बड़ा जजमेंटल गॉड है।

उन्होंने कहा कि अगर ख़ुदा नहीं है तो हमारे जीवन के कोई मायने ही नहीं रह जाएँगे। मैंने उनसे कहा कि आप अपने बेमानी जीवन से डरकर ख़ुदा की ईजाद कर दें, ये तो हक वाली बात नहीं हुई। क्योंकि सच में ही जीवन के कोई मायने नहीं हैं, या अगर हैं तो वो हमें अभी मालूम नहीं हैं। उन्होंने इमैनुएल कान्ट का हवाला देते हुए कहा कि ख़ुदा एक एथिकल-नेसेसिटी है। मैंने उनसे कहा कि अगर कोई आदमी केवल इसलिए चोरी, डकैती, क़त्ल, रेप नहीं करता कि अगर किया तो ख़ुदा इसकी सज़ा देगा- तो ये कोई बहुत बुलन्द नेकी नहीं हुई। नेकी तो वो होती है, जब कोई कहे कि ख़ुदा नहीं है, इंसाफ़ नहीं है, नेकी का कोई इनाम भी नहीं है (कर्म-सिद्धान्त या आखिरत का हिसाब), और इसके बावजूद मैं एक नेक आदमी बनकर रहूँगा- क्योंकि मेरी सोच की रौशनी में नेकी बदी से बेहतर है। इसको कहते हैं किरदार। जो दोज़ख़ के डर से नेक बन गया, वो क्या ख़ाक़ नेक हुआ!

यह सृष्टि दो चीज़ों से मिलकर बनी है- पदार्थ और चेतना। या सांख्य दर्शन का प्रकृति-पुरुष। मज़े की बात यह है कि अपनी तमाम वैज्ञानिक अचीवमेंट्स के बावजूद मनुष्य अभी तक न तो चेतना और न ही पदार्थ का रहस्य जान सका है। दृश्यमान यूनिवर्स सीमित है, जबकि उसमें भी अरबों गैलेक्सीज़ खोज ली गई हैं। उसके परे और विराट ब्रह्मांड है। पदार्थ के भीतर भी जब एटम को तोड़ लिया गया तो समझा गया कि अब पदार्थ का रहस्य मालूम होगा। तीन सब-एटॉमिक पार्टिकल्स मिले। उनमें इलेक्ट्रॉन का स्वरूप पता नहीं चल सका कि वह वेव है या पार्टिकल। क्वांटम एंटेंगलमेंट थ्योरी ने सुझाया कि इलेक्ट्रॉन एक ही समय में दो जगहों पर हो सकता है। इससे न्यूटन तो दूर, आइंस्टाइन का यूनिवर्स भी हिल गया। अनसर्टेन्टी प्रिंसिपल ने जन्म लिया। मुश्किल तब और गहराई, जब पता चला कि सब-एटॉमिक पार्टिकल्स का निर्माण भी क्वार्क्स नामक एलीमेंट्री पार्टिकल्स से होता है। फिर स्ट्रिंग थ्योरी प्रकाश में आई। अब सब गड़बड़झाला है।

बहुत ही फ़ंडामेंटल बात है कि जब तक हम अपने भौतिक विश्व के बारे में पूरी समझ नहीं बना लेते, हम अभौतिक चीज़ों की सच्चाई का दावा कर ही नहीं सकते। क्योंकि न हमें पदार्थ के बारे में कुछ पता, न चेतना के बारे में कुछ मालूम, न ये होश कि जन्म से पहले क्या होता है, न ये ख़बर कि मृत्यु के बाद क्या होता है- मनुष्य अभी ख़ुद को ही समझ नहीं पाया है- और बिलीवर लोग चाहते है कि मनुष्य ईश्वर नामक एक और बड़ी परिकल्पना को अपने ऊपर थोप ले? किसलिए? क्या मजबूरी है? आदमी को आपस में लड़वाने के लिए? धर्म का धंधा चलाने के लिए? राजनेताओं को चुनाव जितवाने के लिए? नहीं भाई, रहने दीजिए।

बिलीवर लोग कहते हैं कि यूनिवर्स को चलाने वाली जो ताक़तें हैं, उनको आप चाहे जो नाम दें, लेकिन हम उसे ख़ुदा कहते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि नहीं, आप उसको ख़ुदा नहीं कह सकते, क्योंकि ख़ुदा लफ़्ज़ के बड़े संगीन कनोटेशन्स हैं, इम्प्लिकेशन्स हैं। हम-आप तो यहाँ प्रबुद्ध चर्चा कर लेंगे, लेकिन बाहर की दुनिया में जो अरबों लोग हैं, वो ख़ुदा को ख़ुदा ही समझते हैं- एक एंथ्रोपोमोर्फ़ीक चीज़, जो फ़ैसले करती है, जो हमारे कामों और नीयत का हिसाब रखती है, गुनाह पर सज़ा, नेकी पर इनाम देती है, जो लोगों को तोड़ती है, आपस में लड़वाती है। महज़ यह अटकल कि इतना फ़ाइन-ट्यून्ड यूनिवर्स है तो कोई फ़ोर्स ज़रूर इसे संचालित कर रही होगी- की बिनाह पर आप मज़हब का पूरा महल नहीं खड़ा कर सकते। यह ग़ैर-जिम्मेदारी है। यह बौद्धिक आलस्य है। क़ा​हिली है। यह कुछ ऐसा ही माजरा है कि आपको ज़रा-सा सुराग़ मिला और आप पूरी तफ़सील ही अपने मनमाफिक तय कर बैठे।

हम एथीस्ट लोग इस नुक़्ते पर ठहरे हैं कि आँखों से दिखाई देने वाला यूनिवर्स वेल-प्रोग्राम्ड तो मालूम होता है (अलबत्ता यह कैआटिक और रैंडम भी कुछ कम नहीं), लेकिन यह क्यों और कैसे और किसके द्वारा प्रोग्राम्ड है, या प्रोग्राम्ड है भी या नहीं, या केवल किन्हीं भौ​तिक-नियमों की निरंतरता के चलते कंसिस्टेंट मालूम होता है- ये न मुझे, न आपको, न किसी और को मालूम है। बिलीवर लोग इस सवाल के नुक़्ते पर आकर क्यों नहीं ठहर सकते?

कोई ज़रूरत नहीं है गॉड की किसी एथिकल फ्रैमवर्क के लिए और ना ही उसकी कोई वैसी लॉजिकल नेसेसिटी है कि उसको रात-दिन सिर पर लेकर घूमा जाए। वास्तव में, गॉड लोगों को झूठा, बेईमान और अनैतिक बनाता है। नैतिक और सच्चा बनने के लिए गॉड का निषेध आवश्यक है। कारण, नैतिकता की शुरुआत ही सच्चाई से होती है और गॉड झूठ का पुतला है। जिस शै की बुनियाद ही झूठ है, वहम है, कल्पना है, अटकल है- वो सच्चाई को पैदा नहीं कर सकती। बबूल के पेड़ पर खजूरें नहीं लग सकतीं।

जनाब जावेद अख़्तर साहब अब बुज़ुर्ग हैं, हाथ काँपते हैं, आवाज़ लड़खड़ा जाती है, इसके बावजूद वो सच्चाई की राह पर अडिग हैं, इसके लिए मैं उनको सलाम करता हूँ और उनको बताना चाहता हूँ कि वो अकेले नहीं हैं। दुनिया में हम जैसे करोड़ों एथीस्ट हैं। हमारी तादाद बढ़ रही है- न केवल यूरोपीय मुल्कों में बल्कि इस्लामिक मुल्कों में भी। जैसे-जैसे इंसान के ज़ेहन में रौशनी का दायरा बढ़ता है, वो ख़ुदा के तसव्वुर के खिलाफ़ बग़ावत करता है और हक की आवाज़ बुलन्द करता है। मैं उम्मीद करता हूँ कि आने वाली सदियों में हम एक ऐसी सेकुलर दुनिया का निर्माण करेंगे, जिसमें हम अपने तईं नेक होंगे, ईमानदार होंगे, सच्चे होंगे। इसके लिए हमें किसी ख़ुदाई-वहम की दरकार नहीं होगी। तभी जाकर हम सही मायनों में सभ्य मनुष्य हो सकेंगे!

Courtesy:Sushobhit-(The views expressed solely belong to writer only)

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