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दुकानदारों को अपनी पहचान छिपाने का हक देना सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर सही माना है?

-अमिताभ राजी की कलम से-

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Positive India: Amitabh Raji:
सुप्रीम कोर्ट ने कावडियों के रास्ते में पड़ने वाले होटल ढाबों और रेस्तरांओं पर उनके मालिकों का नाम लिखने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैंसले पर 26 जुलाई तक अन्तरिम रोक लगा दी है, दुकानदारों को अपनी पहचान छिपाने का हक देना सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर सही माना है ये तो वही जाने लेकिन मेरी समझ में मुझे ये जानने का हक होना ही चाहिए कि मैं किसके हाथ से बना भोजन कर रहा हूँ, बावजूद इसके हमें फैसले का सम्मान करना होगा क्योंकि यही अपेक्षित है।

कहना मुश्किल है कि भारतीय मुसलमान राजनीति का शिकार हुआ है या भारतीय राजनीति मुसलमानों की शिकार होकर रह गई है, शिक्षण संस्थानों में जो मुसलमान बुर्के की वकालत करते हैं कि हमारी महिलाएं अपनी पहचान यानी बुर्का पहनकर ही विद्यालयों में जानी चाहिएँ, वही मुसलमान अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सरकार हमारी पहचान उजागर क्यों करना चाहती है? दुकानों होटलों एवं ढाबों पर हमारा नाम क्यों लिखा होना चाहिए?

जहां एक ओर मुस्लिम वर्ग स्वयं केवल हलाल का मीट (धीरे-धीरे तड़पा-तड़पा कर मारे गए जानवर) खाना ही स्वयं के लिए जायज समझता है, वहीं दूसरी ओर उसे इसमें दिक्कत क्यों है कि शाकाहारी लोग ढाबों पर निश्चिंत होकर भोजन कर सके कि हम ऐसे बर्तनों में पका भोजन नहीं कर रहे, जिनमें मीट भी पका हो सकता है।

बड़े आश्चर्य का विषय है कि भारतीय मुसलमान सिविल लॉ (विवाह तलाक या उत्तराधिकार) तो शरिया कानून के हिसाब से चलाए रखना चाहता है, जबकि क्रिमिनल लॉ में वह अपने लिए शरिया कानून नहीं चाहता जिसमें चोरी करने वाले के हाथ काटने का प्रावधान है तथा व्यभिचारी व्यक्ति को पत्थर मार-मार कर हत्या करने का विधान है, और मजे की बात यह है कि भारतीय राजनीति इन्हें इस दोहरे चरित्र को अपनाने की न सिर्फ इजाजत देती है बल्कि उनका पुरजोर समर्थन भी करती है।

एक समय था जब वोट के लिए सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस उनके इस दोहरे चरित्र को बढ़ावा देती थी, जबकि वर्तमान में सत्ता लोलुप विपक्ष उनकी हर नाजायज़ मांग में उनसे भी आगे बढ़कर उनका अंध समर्थन करने में संलग्न रहता है।
कोई भी हिंदू या मुसलमान, बशर्ते वह दोगला ना हो, इस बात को अच्छे से समझ सकता है कि क्रिमिनल लॉ भारतीय संविधान के हिसाब से मानने में अगर उनका मजहब आड़े नहीं आता तो शादी और तीन तलाक ही उन्हें सरिया के हिसाब से क्यों चाहिए ? अगर कालेज या ऑफिस में बुर्का और टोपी यानी अपनी पहचान दिखाना जायज़ है तो अपने प्रतिष्ठानों पर अपनी पहचान लिखना कैसे नाजायज़ हो जाता है? और उस पहचान को छिपा कर शिवा ढाबा, गणपति ढाबा या संगम होटल जैसे नाम लिखना कैसे कोई साधारण इंसान, राजनेता, मीडिया या फिर न्यायालय भी जायज ठहरा सकता है? क्या उनका यह आचरण सरासर धोखा नहीं है? जबकि इसमें तो उनकी पहचान तो छिपाई जा ही रही है बल्कि वह नाम उसमें लिख रहे हैं जो उन्हें लेना भी हराम बताया जाता है। मुसलमानों द्वारा वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलना जिन्हें हराम लगता है, वही आज शिवा ढाबा, गंगा होटल, श्री श्याम रेस्टोरेंट आदि नामो को मुसलमानों द्वारा अपने प्रतिष्ठानों पर लिखने की वकालत कर रहे हैं।

मुस्लिम प्रतिष्ठानों पर हिंदू नाम लिखने का उद्देश्य हिंदुओं को धोखा देकर उनका धर्म भ्रष्ट करने और उनकी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं माना जा सकता, और ज्यादा आश्चर्य जनक बात यह इसलिए भी है कि केवल मुसलमान को नहीं कहा गया है अपने प्रतिष्ठानों पर अपना नाम लिखने के लिए, यह आदेश सभी के लिए है, हिंदुओं के लिए भी यह आदेश समान रूप से लागू था।
अब सवाल यह है कि जो नियम सबके लिए है उसमें भी कोर्ट को कुछ अनुचित या एक वर्ग के साथ पक्षपात कैसे नजर आ जाता है ?

और सवाल यह भी बनता है कि मुसलमानों को यह सब वास्तव में नजर आता भी है या फिर वो जानबूझकर संविधान और शरिया में से केवल वही चीजें अपनाते हैं जिनमें उनको लाभ दिखाई देता है, और वो ऐसा करें भी क्यों नहीं, जब भारत में ऐसे लोभी लालची और कुनबा परस्त नेताओं की उपलब्धता हर वक्त रहती है जो उनकी इन बेसिर-पैर की बातों को उनसे भी अधिक चिल्ला चिल्ला कर उठाते हैं, बाकी रही-सही कसर कुछ मीडिया हाउस विदेशी फंड के लालच में पूरी कर देते हैं, और रही बात न्यायालयों की, तो वहाँ भी तो हाड-मास के इंसान ही बैठे हैं, कोई देवता या फरिश्ते तो हैं नहीं कि उनमें इंसानी दोषों की कल्पना की ही न जा सकती हो।

साभार:अमिताभ राजी-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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