
पब्लिसिटी का भूखा नेता या चमचा आरक्षण के बहाने ब्राह्मणों को धमकी देता रहता है
-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
पिछले पच्चीस वर्षों में आरक्षण के विरुद्ध कहीं कोई जनसभा हुई हो, कोई रैली या कोई प्रदर्शन हुआ हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता। दिल्ली की सड़कों पर रोज ही अतरंगी अतरंगी बातों के लिए धरना प्रदर्शन होते हैं, लेकिन आरक्षण के विरुद्ध कभी कोई नहीं उतरा। यदि फेसबुक की अनावश्यक खींचतान को छोड़ दिया जाय तो सवर्णों का विरोध कहीं नहीं दिखता। उन्होंने रिजर्वेशन को स्वीकार कर लिया है और अब नौकरियों से इतर विकल्पों की ओर बढ़ भी गए हैं।
वैसे भी, मैं अब मानने लगा हूँ कि रिजर्वेशन का विरोध अब सवर्णों का मुद्दा ही नहीं रहा। मात्र पाँच से दस साल के भीतर यह ओबीसी का विषय होगा। परीक्षाओं में ओबीसी का कटऑफ अब सामान्य श्रेणी के लगभग बराबर ही रहने लगा है। आरक्षण वाली व्यवस्था अब सवर्णों से अधिक उन्हें चुभती है, बस वे अभी बोल नहीं रहे हैं।
फिर भी आप देखेंगे कि रोज ही कोई न कोई पब्लिसिटी का भूखा नेता या चमचा आरक्षण के बहाने ब्राह्मणों को धमकी देता रहता है। इन धमकियों या गलीबाजी के पीछे आरक्षण हटने का भय बिल्कुल भी नहीं होता, क्योंकि वे भी जानते हैं कि ब्राह्मणों को आरक्षण से कोई विशेष दिक्कत नहीं रही। वे घृणा के कारण ऐसा करते हैं। यह घृणा क्यों और कैसे जन्मी है, यह बड़ा विषय है।
पिछले हप्ते से उस अधिकारी का बयान वायरल हो रहा है जिसने धमकी के स्वर में यह कहा है कि जबतक ब्राह्मण उसके बेटे को अपनी बेटी दान नहीं करते तबतक आरक्षण बना रहेगा। यह पूरी तरह से चुतियाटिक बात है। यह ऐसा ही है जैसे कोई ब्राह्मण युवक कहे कि जबतक अधिकारी महोदय मेरा विवाह अपनी बेटी से न करा दें, तबतक मैं धोती पहनना नहीं छोडूंगा। अरे भाई, आरक्षण हटाने के लिए ब्राह्मण कुछ भी क्यों करेगा? बिहार में नीतीश जी ने जातिगत जनगणना के बाद रिजर्वेशन बढ़ा दिया, कहाँ ब्राह्मण उनके विरुद्ध हो गए? आपने आरक्षण को बढ़ाते बढ़ाते पचहत्तर प्रतिशत कर लिया, कहाँ कल को सौ कर लीजिये। ब्राह्मण या कोई सवर्ण इसके विरुद्ध नहीं बोलता है भाई…
दरअसल उस अधिकारी के मन में ब्राह्मणों के लिए इतनी घृणा भरी है कि वह थोड़ी सी भाषा बदल कर उनकी बेटियों को सरेआम गाली दे रहा है। आरक्षण तो बहाना है, उसने ब्राह्मण लड़कियों को सदैव इसी गन्दी निगाह से देखा होगा। और ऐसी घृणा पाल कर जीने वह अकेला तो नहीं है…
मैंने सुना कि अधिकारी महोदय अपनी उस घिनौनी बात के लिए माफी मांग लिए हैं। पर क्या केवल माफी मांग लेने से बात खत्म हो जाती है? यदि यही बयान उसने किसी दूसरी जाति की लड़कियों के लिए दिया होता तो उसे माफी मिल जाती? शायद नहीं…
मुझे समझ नहीं आता कि इतने उच्च पद पर पहुँचने के बाद भी इनकी कुंठा समाप्त क्यों नहीं होती…
साभार:सर्वेश कुमार तिवारी-(यह लेखक की अपने विचार हैं)
गोपालगंज, बिहार।