
राहुल गांधी के अधिकांश एटम बम प्रश्नों को सुन कर आम जनता हँस दे रही है
-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

Positive India: Sarvesh Kumar Tiwari:
श्रीयुत राहुल गांधी जी का वीडियो देखा। उनके प्रश्न भी सुने। गाँव देहात का एक सामान्य समझ वाला व्यक्ति, जो थोड़ा बहुत भी राजनीति में एक्टिव हो, वह उनके अधिकांश प्रश्नों को सुन कर हँस देगा। यदि किसी व्यक्ति को उनके आरोप सचमुच एटम बम लग रहे हों, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उस व्यक्ति की राजनैतिक समझ शून्य है।
राहुल जी के प्रश्न देखिये- भारत जोड़ो यात्रा में जितने लोग मेरे साथ थे, उतने वोट नहीं मिले। वहाँ मैं हार ही नहीं सकता था, कैसे हार गया?
ऐसा भरम दिमाग में तब आता है जब आदमी समाज से बिल्कुल कटा होता है। गाँव देहात की समझ होती तो जानते कि वोटर अब नेताओं से अधिक चतुर हो गया है। वह सुबह में रामलाल के साथ होता है, दोपहर में झामलाल के साथ और शाम को श्यामलाल के साथ… भीड़ और वोट में अंतर नहीं समझेंगे तो परधानी हार जाएंगे, आपको तो प्रधान बनना है।
उनका दूसरा दावा है कि एलेक्शन कमीशन से वोटर लिस्ट और वोटिंग का विडीयो मांगा, वह नहीं दे रहा है।
यकीनन यह निहायत ही बकवास बात है। हर बूथ का वोटर लिस्ट आपके पोलिंग एजेंट तक के पास होगा। वहाँ के बीएलओ के पास होगा, वहाँ के मुखिया, सरपंच, वार्ड पार्षद के पास होगा। आयोग नहीं देता वाली बात ही अजीब है। और जहां तक वोटिंग की वीडियो मांगने वाली बात है, तो वोटिंग की वीडियो बनाना ही अपराध है। एक वोटर किसे वोट कर रहा है इसकी गोपनीयता भंग नहीं की जा सकती। इतनी बात गाँव में वार्ड या पंच का चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति भी जानता है।
वे आगे कह रहे हैं कि आयोग डिजिटल डाटा नहीं देता, बल्कि कागज में डाटा देता है। कागज से जाँच नहीं हो सकती, डिजिटल डेटा से हम जान लेंगे।
क्या आपको यह बात मूर्खतापूर्ण नहीं लगती? प्रिंट में उपलब्ध सामग्री डिजिटल में कम हो जाएगी क्या? सामग्री तो उतनी ही रहेगी। और चुनाव तो उसी प्रिंट सामग्री के ही आधार पर होता है न? और जिस तरह देश डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहा है, आज नहीं तो कल सबकुछ डिजिटल हो ही जायेगा। पर इसके बेस पर आयोग को चोर कैसे कहा जा सकता है?
वे आगे कह रहे हैं कि यदि डिजिटल डाटा होता तो हम पन्द्रह मिनट में देश भर की जाँच कर देते।
सौ करोड़ से अधिक वोटर वाले इस देश के बारे में यह कहना विशुद्ध फेकैती है। भारत में इस लेबल की बात केवल और केवल राहुल जी ही कर सकते हैं।
उनका अगला प्रश्न एक ही हाउस नम्बर में अस्सी लोगों को लेकर है। यह बिल्कुल सही बात है। पर बिहार समेत देश के अधिकांश हिस्सों में कोई स्थाई हाउस नम्बर नहीं है। ग्रामीण इलाके में हाउस नम्बर का कोई सिस्टम ही नहीं है। कांग्रेस शासित राज्यों में भी नहीं। ऐसे में बीएलओ केवल खानापूर्ति करता है। सो पूरे देश के वोटर लिस्ट में हाउस नम्बर का फाल्ट मिलेगा। पर इसे वोटर चोरी से जोड़ना मूर्खता का चरम है।
उनका अगला आरोप है कि एक ही व्यक्ति दो अलग अलग स्थानों पर वोटर है। यह भी वैसी ही बात है। ग्रामीण इलाके से पलायन कर के शहर में रहने वाले अधिकांश लोगों के नाम दोनों जगह होंगे। जबतक वोटर लिस्ट को आधार पैन से नहीं जोड़ा जाता तबतक इसे सुधारने का कोई तरीका नहीं। चुनाव आयोग बिहार से इसे सुधारने की शुरुआत कर रहा है, पर यहाँ राहुल जी और उनके साथी ही इसका विरोध कर रहे हैं। इस दोमुंहेपन को देश समझ ही रहा है।
तो तीन दिन से बवाल काट रहे वामी लेखक मित्रों! कुल मिला कर बात यह है कि मछली पकड़ने के लिए तालाब में उतर कर पानी में हाथ डाले आप जिस वस्तु को पकड़ कर प्रसन्न हो रहे हैं, वह रोहू नहीं है दोस्त! वह बगल वाले लड़के की…
साभार:सर्वेश कुमार तिवारी (यह लेखक की अपने विचार हैं)