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India Got Latent के रणवीर अल्लाहबादिया पर थूकना चाहिए

-कुमार एस की कलम से-

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Positive India:Kumar S:
India got latent
और भयंकर-अश्लील-रणवीर-अल्लाहबादिया का कमैंट।
कई वर्ष पहले हमारा एक सहपाठी पढ़ने के लिए दिल्ली चला गया और वहां टुकड़े टुकड़े गैंग के सम्पर्क में आया।
2012-13 के समय उससे हमारी भयंकर बहस होती थी।
वह कुछ पत्रकारों के सम्पर्क में था और वे उससे ऐसे अनुभव या स्टोरी लिखवाते थे जिससे समाज का अत्यंत घृणित और विद्रूप सत्य बाहर आता था।

उसके वर्णन प्रायः सत्य प्रतीत होने वाले चाइल्ड एब्यूज, छुआछूत, घरेलू झगड़े में मां बहिन की गालियां, आहार की सात्विकता का मजाक, अत्यधिक शुचिता को #दकियानूसी_बताना, हस्तमैथून के लाभ इत्यादि के अतिरंजित चित्रण पर आधारित होते।
इससे उसे भ्रम हो गया कि वह कोई बड़ा पत्रकार बन गया है।
एक दिन बहस में मैंने कहा “अपने पेरेंट्स के बेडरूम में कैमरा लगाकर टेलीकास्ट करो तो इससे भी ज्यादा कमाई होगी।”
फिर लगभग हम नाराज ही रहे और वह नाराजगी अब तक चल रही है।

बाजार मनुष्यों को नँगा होने का लालच देता है। वामपंथी उस नंगई हेतु प्रोत्साहित करते हैं।
टैबू आहार, टैबू व्यवहार और टैबू विचार का अपना आकर्षण होता है। प्रतिदिन वेश्यागामी मनुष्य भी दूसरे के वेश्यागमन की बात को चटखारे लेकर सुनता है।
यह जहर है। यह आसुरी है। यह विनाशक है। जहर को कोई शिव ही पचा सकता है। जिस कोमल भारतीय पीढ़ी को यह जहर चटाया जा रहा है, उनकी पाचन शक्ति इतनी नहीं है कि उन्हें ऐसे अश्लील वार्तालाप परोसे जाएं।
वास्तव में, इन कार्यक्रमों ने भारतीय युवाओं को हृदयहीन, संवेदना रहित और निस्तेज बनाया है। उनके भीतर का दिव्यत्व समाप्त करने का षड्यंत्र है यह।

जब हम कहते हैं कि हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा बच्चा राम है। तब हम मनुष्य में देवत्व की प्रतिष्ठा कर रहे होते हैं।
वैसे तो बता चुका हूँ, स्वस्तिक के बाहर घिरी रेखाओं के संदर्भ में कि देवता आवृत होते हैं और जो अनावृत है वह दैवीय तो कदापि नहीं।
बन्द कमरों में, एकांत में और निश्चित स्थान पर देवता भी वही कर्म करते हैं जो असुर करते हैं लेकिन वे मर्यादा को नहीं छोड़ते।
अथवा जो मर्यादित है वह देवत्व है, वही दिव्यत्व है, वही द्युतिमान है, वही पूज्य है।
भारत के मर्यादित वातावरण में क्षोभ उत्पन्न किया वामपंथियों ने।
उन्होंने वर्जित विषयों को मुख्यधारा का विषय बनाया।
चुनचुनकर उन विषयों को अपने तरीके से व्याख्या की जो सभ्य नहीं थे, अर्थात सभा में कहने लायक नहीं थे।

आज जो खुलेआम गाली गलौज हो रहा है उसकी जड़ें कुंठित कुत्सित वामपंथी मानसिकता में है। विश्वनाथ (सरिता, मुक्ता, सरस सलिल जैसी पत्रिकाओं के सम्पादक) के जमाने से अश्लीलता और वर्जनाओं को तोडने को प्रगतिशीलता कहकर प्रचारित किया गया।
आज यह परिवार के सदस्यों को लेकर विद्रूप #यौन_टिप्पणियों तक है, कल को कोई यह सब सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर दे तो बड़ी बात नहीं।

भारत तेरे टुकड़े होंगे, एक ऐसा ही साधारणीकरण था कि राष्ट्रद्रोह भी कोई शर्मिंदगी का विषय नहीं है।
और यह मनुष्यों को उत्तरोत्तर नीचे गिराने की मुहिम है। पतन की पराकाष्ठा तक।
एक बार जब कोई गिरावट आरम्भ हो जाती है तो फिर गिरती ही चली जाती है।
इससे पहले कि पानी सर से ऊपर जाए, इन पर प्रतिबंध भी लगे और पब्लिक इन्हें जूते मारे।

साभार: कुमार एस-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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