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लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा: चौथी किश्त

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Positive India:Kanak Tiwari:
(14) 20 फरवरी 1987 को सुप्रीम कोर्ट ने बचनलाल कलगोत्रा बनाम जम्मू कश्मीर राज्य के फैसले में उपरोक्त प्रावधानों को लेकर अपना दुख, असमर्थता और सुझाव व्यक्त किया। राज्य के नियमों और अधिनियम के अनुसार जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासी यदि भारत पाक विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए और वहां से लौटकर फिर आए तो उन्हें भी रिसेटेलमेन्ट अधिनियम 1982 के अनुसार पुनः स्थायी निवासी होना प्रमाणित किया जाएगा। लेकिन यदि कोई व्यक्ति भारत पाक विभाजन की त्रासदी के कारण मजबूर होकर पाकिस्तान क्षेत्र से कश्मीर में आकर बस गया हो तो उसे राज्य के स्थायी नागरिक होने का अधिकार नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी हताशा में कहा कि पाकिस्तान से आए शरणार्थीनुमा भारतीय जम्मू कश्मीर के संविधान के रहते पीढ़ियों बाद भी वहां के स्थायी नागरिक नहीं माने जा सकते-यह प्रथम दृष्टि में यह अन्यायपूर्ण है। भारत पाक विभाजन के बाद अन्य व्यक्ति जो पाकिस्तान से आकर भारत के अन्य राज्यों में बस गए हैं उन्हें तो पूरी तौर पर नागरिक मान लिया गया है। उन्हें नौकरी, रोजगार, चुनाव, व्यापार, शिक्षा आदि सभी अधिकार हैं जो मूलतः भारत क्षेत्र में ही रहने वाले नागरिकों को आजादी के बाद मिले हैं। इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केन्द्र सरकारों को उचित अधिनियम बनाने की सलाह दी जिससे शरणार्थी की तरह बसे पीढ़ियों तक नागरिकता की आस लिए व्यक्तियों को राहत दी जा सके। दुख यही है कि आज तक किसी भी केन्द्र या जम्मू कश्मीर सरकार ने इस संबंध में कोई पहल नहीं की। त्रासदी का यह एक मुख्य कारण है।

(15) अनुच्छेद 370 में व्यक्त अपवादों और रूपांतरणों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने बार बार विचार किए हैं। मोटे तौर पर अभिमत स्थिर हुआ कि राष्ट्रपति को दिए गए विशेषाधिकार भारत के संविधान की मूल भावना या लेखी का उल्लंघन नहीं करते। संविधान संशोधन संबंधी अनुच्छेद 368 और अनुच्छेद 370 (1) में विरोधाभास नहीं है। जम्मू कश्मीर की संविधान सभा (जिसे बाद में विधानसभा भी समझा गया क्योंकि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा संविधान बनाते ही विघटित हो गई थी) की सलाह से राष्ट्रपति जम्मू कश्मीर के लिए विधायन या अन्य आदेश करते समय स्वविवेक से निर्णय कर सकते हैं। ऐसा करना संविधानसम्मत होगा क्योंकि ये अधिकार उन्हें जम्मू कश्मीर राज्य और भारत सरकार के बीच हुए अधिमिलन विलेख, भारत के राष्ट्रपति के आदेश और दिल्ली करार की भावना तथा क्षेत्राधिकार के तहत माने जाएंगे। अनुच्छेद में 370 (3) की भाषा का भविष्यमूलक उपयोग जिस तरह हुआ है, उसकी परिकल्पना भी तत्कालीन केन्द्र और राज्य सरकार को नहीं रही होगी। अनुच्छेद 370 को रखने या विलोपित करने का अनुच्छेद 370 (3) संविधान के विचारकों और व्याख्याकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।

(16) एक महत्वपूर्ण बात की ओर किसी का ध्यान सहसा नहीं जाता है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कई मुद्दों पर अपनी सीधी, सपाटबयानी की भाषा में तर्क, तथ्य और आंकड़ों की अंकगणित गूंथी है। कुछ सपने भी दिखाए हैं और पहले हुए स्वप्नदोष को रेखांकित भी किया। समझना होगा कि देश की किसी भी अन्य रियासत के मुकाबले अपनी भौगोलिक, सामरिक, सामासिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते समय ही नहीं होने पर अनुच्छेद 370 को किस पृष्ठभूमि में संविधान सभा ने पारित किया होगा। अधिमिलन विलेख तहरीर हो गया तब कोई औचित्य नहीं बचा सिवाय इसके कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख भारत संघ का अविभाज्य अंग हो गये। अनुच्छेद 370 (3) तथा (2) को ध्यान से पढ़ने पर नेहरू की अगुवाई में संविधान सभा की कूटनीतिक चतुराई, भविष्यमूलकता, देशभक्ति और जम्मू कश्मीर संबंधी स्थितियों को अपनी व्यापक उदारता के चलते समझने में आज किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए। ये प्रावधान ही हैं जिनके कारण आज मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर के संबंध में जो ऐतिहासिक निर्णय लिया है उसका श्रेय पुरखों की विवेकबुद्धि को पहले और ज्यादा दिया जाना चाहिए। यदि ये प्रावधान नहीं होते तो जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति के अस्थायी उपबंध को हटाने के लिए संविधान संशोधन का सहारा लेना पड़ता जो एक कठिन काम होता। ये प्रावधान इस तरह हैंः-

370. (3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित ही और ऐसी तारीख से, प्रवर्तन में रहेगा, जो वह विर्निदिष्ट करेः

(2) यदि खंड (1) के उपखंड (ख) के पैरा 2 में या उस खंड के उपखंड (घ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट उस राज्य की सरकार की सहमति, उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाए जाने से पहले दी जाए तो उसे ऐसी संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जाएगा जो वह उस पर करे।

उपरोक्त प्रावधानों को ध्यान से पढ़ने पर गृह मंत्री अमित शाह को भारतीय संविधान सभा के सदस्यों को कृतज्ञता ज्ञापित करनी थी। यदि ऐसा प्रावधान नहीं होता तो वे किस तरह अनुच्छेद 370 को बहुत आसानी से राष्ट्रपति के आदेश के जरिए हटाकर देश और इतिहास से वाहवाही लूटने का जतन करते। इसे कहते हैं संवैधानिक सूझबूझ की पेचीदा स्थितियों में भी जम्मू कश्मीर के महाराजा, जनता, अंगरेज गवर्नर जनरल और हिन्दू महासभा के प्रतिधियों आदि को विश्वास में लेकर ऐसी व्यूह रचना कर दी जिसे बाद में देश के बेहद ईमानदार और निष्कपट गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा ने एक सुरंग की संज्ञा दी जिसके अंदर से दिल्ली से जम्मू कश्मीर तक जाना भारत के संविधान के प्रावधानों के लिए सरल होता रहा। सुरंग का प्रतीक अद्भुत है। उसके अंदर से रेलगाड़ी अपने इंजन की रोशनी के साथ निकल जाती है। अंधेरा हार जाता है। लेकिन बाहर से कुछ समझ नहीं आता कि अंदर कौन चल रहा है। अनुच्छेद 370 यदि खोल है तो उसके अंदर अनुच्छेद 370 (3) वह सरकार नामक इंजिन की रोशनी रही है जिसे जलाते हुए अमित शाह और नरेन्द्र मोदी ने इतिहास रचने का श्रेय ले लिया। अन्यथा उन्हें बहुत मुश्किलें होतीं। यह आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस के आलिम फाजिल सांसदों कपिल सिब्बल, शशि थरूर, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी और अधीररंजन चौधरी ने इस नजर से पूरे मामले को देखकर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद तथा अंबेडकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि तीन सौ से अधिक संविधान सभा के सदस्यों की व्यापक सहमति की तारीफ करते कोई जिरह नहीं की।

(17) साफ लिखा है कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 (3) के तहत लोकअधिसूचना द्वारा अनुच्छेद 370 को ही निरस्त तो कर सकते हैं लेकिन शर्त यह है कि राष्ट्रपति ऐसा जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश मिलने पर ही करेंगे। जम्मू कश्मीर संविधान सभा अपना कार्य पूरा करने के बाद स्थायी रूप से विघटित कर दी गई है। इसका आशय है कि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा को फिर से गठित करने के प्रावधान रचने होंगे जो अब तक नहीं किया गया। यदि जम्मू कश्मीर की विधानसभा को ही संविधान सभा मान लिया जाए तो वह भी फिलहाल भंग है। वहां कार्य राज्यपाल के जिम्मे है। हैरत की बात है कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बार बार कहा राज्य में सब कुछ सामान्य है। किसी को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। फिर यह अजूबा हुआ।

संघशासित क्षेत्रों को राज्य के बराबर दर्जा मिले इसके लिए दिल्ली और पुडुचेरी राज्य अपनी विधानसभाओं सहित सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी उपराज्यपालों के अनावश्यक हस्तक्षेपों के पर कतरे भी हैं। भारत के संवैधानिक इतिहास में पहली बार हुुआ कि जम्मू कश्मीर जैसे राज्य का अवमूल्यन कर उसे केन्द्रशासित क्षेत्र बना दिया गया। अनुच्छेद 370 (2) तथा (3) हटाए जाने के बावजूद जम्मू कश्मीर की जनता द्वारा निर्वाचित भविष्य की संभावित विधानसभा पर भरोसा किया जा सकता था। वह भी नहीं किया गया। विधानसभा भंग होने की स्थिति में राज्यपाल ने अनुच्छेद 370 (2) तथा (3) को विलोपित करने की सलाह दी होगी जो विवादास्पद लगता है। अतिरिक्त प्रश्न है कि यदि राज्य की संविधान सभा विघटित होगी और उसके बदले केन्द्र सरकार राज्य की विधानसभा की सहमति से लगातार विधायन और संशोधन करती रहे तो अब विधानसभा के बदले केन्द्र अपने नुमाइंदे राज्यपाल को ही विधानसभा समझकर यदि उनसे सहमति लेता है कि यह तो ऐसा हुआ कि बाएं हाथ के अनुरोध पर दायां हाथ आए और दोनों मिलकर ताली बजाने लगें।

(18) ऐसी स्थिति में एक विरोधाभासी संवैधानिक स्थिति पैदा हुई लगती है क्योंकि जम्मू कश्मीर के संविधान के अनुसार स्थायी नागरिकता का निर्धारण करने वाली 1927 और 1932 की अधिसूचनाएं अभी जीवित मानी जाएंगी। इसके अतिरिक्त एक सार्वभौम भारत सरकार द्वारा अधिमिलन विलेख के समय जम्मू कश्मीर के महाराजा को दिया गया वचन संविदा अधिनियम और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की व्याख्याओं के अनुसार अपना निर्वचन मांगेगा। आश्वासन तो संविधान सभा में भी एन. गोपालस्वामी आयंगर ने भारत की तरफ से दिया था। वह संवैधानिक इतिहास का हिस्सा है। उस पर भारत की संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। उन्हें नहीं मालूम था कि भविष्य के राष्ट्रपति क्या आदेश करेंगे या जम्मू कश्मीर की संविधान सभा कैसा आंतरिक संविधान बनाएगी। नहीं मालूम था कि भारत की संसद संविधान सभा के बदले विधानसभा और फिर राज्यपाल पढ़ लेगी और संविधान के अनुच्छेद 370 (1) के अधिकारों के तहत 370 (2) और (3) के प्रावधानों को विलोपित कर देगी। उसका भूतलक्षी प्रभाव भी किया जाएगा। संविधान की विसंगतियों के इन्हीं मुख्य बिंदुओं पर संभवतः भारत के सुप्रीम कोर्ट कोर्ट और अन्य संविधान विशेषज्ञों को न्याय करने के लिए जूझना पड़ेगा।
साभार:कनक तिवारी

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