
जो हमें आईना दिखाए, हम उसी को पत्थर मार देते हैं।
-संदीप तिवारी राज की कलम से-

Positive India:Sandeep Tiwari Raj:
जब कोई संत समाज के पतन की ओर इशारा करता है, तो उसका अपमान करना सबसे बड़ा पाप होता है। हाल ही में पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का एक बयान वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने लड़के-लड़कियों के स्कूल में प्रेम संबंधों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा था कि “आजकल बच्चे 8वीं-9वीं में ही बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड बना लेते हैं, जिससे घर, समाज और संस्कृति का संतुलन बिगड़ रहा है।” उनका यह कथन कुछ लोगों ने जानबूझकर अधूरा काटकर ऐसे प्रस्तुत किया जैसे वो किसी विशेष वर्ग या लिंग को अपमानित कर रहे हों। लेकिन सच्चाई यह है कि महाराज ने जो कहा, वो उस पीड़ा से उपजा हुआ सच है जिसे हम सब देख रहे हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
“विनाश काले विपरीत बुद्धि”,
आज हम उसी दौर में हैं, जहां जो हमें आईना दिखाए, हम उसी को पत्थर मार देते हैं।
क्योंकि आजकल अगर कोई “बचपन को बचाने” की बात करे तो उसे “पिछड़ा सोच” कहा जाता है। मगर जो बच्चे को “एडल्ट लाइफस्टाइल” सिखाए, वो “प्रगतिशील” कहलाता है। क्या यह समाज के लिए शुभ संकेत है? महाराज का आशय लड़कियों या लड़कों को नीचा दिखाना नहीं था, बल्कि उन्होंने दोनों को एक ही कसौटी पर रखा—कि जिस उम्र में विद्या, संस्कार और सेवा का अभ्यास होना चाहिए, उस उम्र में प्रेम के नाम पर भावना का व्यापार हो रहा है।
“न बालकस्यापि गुरुं लंघयेत्” — बालक भी गुरु की अवमानना न करे, यह हमारी परंपरा है। और हम? हम तो संतों को ट्रोल कर रहे हैं।
क्या आपने कभी किसी माँ-बाप को यह कहते नहीं सुना कि “हमारा बच्चा आजकल मोबाइल में बहुत उलझ गया है”?
क्या आपने कभी स्कूलों में होने वाले बाल अपराधों की खबरें नहीं पढ़ीं?
क्या यह सत्य नहीं है कि किशोर अवस्था में रिश्तों की समझ नहीं होती, पर सोशल मीडिया ने उन्हें उम्र से पहले बड़ा बना दिया है?
प्रेमानंद जी ने इसी समय से पहले जली लौ से सावधान किया। वो कह रहे थे—बेटा-बेटी दोनों मर्यादा में रहें, ताकि आगे चलकर उनका जीवन स्थिर और सम्मानजनक बने।
कभी कबीर ने कहा था—
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर,
आशा त्रिष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर।”
आज यही माया, आशा और आकर्षण बालकों के मन पर हावी हो रही है।
इसमें दोष प्रेमानंद जी का नहीं, बल्कि उस समाज का है जो कड़वी दवा को झूठ समझता है, और मीठे ज़हर को सच मान लेता है। अगर किसी संत ने संयम की बात कह दी तो उसे ट्रोल कर दो, लेकिन जो खुलेआम फूहड़ता परोसे, उसे कला कहकर पुरस्कार दो।
एक और शेर याद आता है—
“सच कहा जाए तो बुरा लगता है,
झूठ में हर कोई सजा लगता है।”
संतों का काम ताली पाना नहीं, जागृति जगाना है। प्रेमानंद जी वही कर रहे थे। उन्होंने किसी को गाली नहीं दी, किसी धर्म, जाति या वर्ग को अपमानित नहीं किया। उन्होंने केवल यह कहा कि यदि दिशा सही न हो, तो ऊर्जा भी विनाश कर सकती है।
हमें यह समझना चाहिए कि ब्रह्मचर्य, संयम और संस्कार कोई रूढ़ियाँ नहीं हैं, बल्कि वो नींव हैं जिन पर समाज की इमारत खड़ी होती है। जिस दिन हम इन्हें मिटा देंगे, उस दिन हमारी अगली पीढ़ी आत्मा से खोखली हो जाएगी।
तो अगर आज कोई संत हमें यह कहे कि “सावधान हो जाओ”, तो उसे मज़ाक मत समझो। हो सकता है वो तुम्हारे बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए अकेला लड़ रहा हो।
कुछ पल रुकिए, सोचिए—कहीं ये आधुनिकता के नाम पर हम अपने भविष्य से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे…???
साभार:संदीप तिवारी राज-(यह लेखक के अपने विचार हैं)