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फ़िरदौसी और उसका शाहनामा

-राजकमल गोस्वामी की कलम से-

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Positive India: Rajkamal Goswami:
फ़िरदौसी और उसका शाहनामा
सातवीं सदी के अरब विजेता जहाँ जहाँ गये वहाँ की भाषा संस्कृति इतिहास सब नष्ट कर दिया और अरबी भाषा को प्रचलन में ले आये । इस्लाम पूर्व मिश्र की कॉप्टिक भाषा पूरी तरह नष्ट कर दी गई । जब अम्र बिन आस की सेना ने अलेक्ज़ेंड्रिया को जीत लिया तो वहाँ की विश्व प्रसिद्ध लाइब्रेरी को देख कर अरब विजेता ठिठक गए । उन्होंने ख़लीफ़ा उमर के पास संदेश भिजवा कर पूछा कि इन किताबों का क्या करना है ? ख़लीफ़ा का जवाब आया कि अगर वे किताबें क़ुरान के ख़िलाफ़ हैं तो नष्ट कर दो और अगर पक्ष में हैं तो हमारे पास उनसे बेहतर किताब क़ुरान है । अरब सेना ने आज्ञा के अनुपालन में सदियों से संग्रहीत उन किताबों को जला कर ताप डाला और इस तरह अपनी ठंड दूर की । ईराक़ से लेकर पश्चिम में अफ़्रीका पार करके मोरक्को तक आज अरबी ही बोली जाती है । उनका पुराना इतिहास मिट चुका है अगर कुछ मिलता भी है तो ग्रीक और रोमन श्रोतों से ही मिलता है ।

ईरान में भी यही हुआ । यहाँ की भाषा प्राचीन साहित्य धर्म धार्मिक स्थल पुस्तकालय सब नष्ट कर दिए गये । ईरानी राष्ट्रीय गौरव नाम का कुछ भी बाक़ी न बचा । लोगों को मुसलमान बना लिया गया और कुछ बचे खुचे पारसी अपनी पवित्र अग्नि के साथ भारत आ गए । जिन्हें अरबी नहीं आती थी वे अज़मी घोषित कर दिए गए । अज़मी का मतलब गूँगा । जैसे जिसने लाहौर नहीं देखा मानो वो पैदा ही नहीं हुआ उसी तरह जिसे अरबी नहीं आती मानो वह गूँगा ही है ।

ईरानियों का धर्म तो बदल गया उसमें अब कुछ हो भी नहीं सकता था क्यों कि पारसी लोग भी हम हिंदुओं की तरह अपने धर्म में बाहरी लोगों को स्वीकार नहीं करते हैं । लेकिन लोक कथाओं में प्राचीन ईरान का गौरव गान चलता रहा । समय बदला और ईरान को अरब आधिपत्य से छुटकारा मिल गया और उसे अपने प्राचीन राष्ट्रीय गौरव का ध्यान आया ।

ऐसे समय फ़िरदौसी ने शाही फ़रमान से तीस वर्षों के अथक परिश्रम से प्राचीन ईरानी बादशाहों और प्रसिद्ध योद्धाओं के इतिहास पर आधारित अमर महाकाव्य शाहनामा लिखा। यह विश्व साहित्य का महत्वपूर्ण ग्रंथ है । माना जाता है कि यदि शाहनामा न लिखा गया होता तो फ़ारसी भाषा अपनी ८०% शब्द संपदा और सौ प्रतिशत प्राचीन इतिहास को खो बैठतीं । रुस्तम सोहराब का कोई नाम भी न जानता होता ।

फ़िरदौसी को साठ हज़ार शेरों में रचित इस काव्य के बदले प्रति शेर एक सोने का सिक्का मिलना था । महमूद ग़ज़नवी का हरकारा जब तक सिक्के लेकर पहुँचा तब तक फ़िरदौसी का जनाज़ा निकल चुका था ।

फ़िरदौसी के शाहनामा ने फ़ारसी भाषा को जीवनदान दे दिया उसने ईरान के राष्ट्रीय गौरव इतिहास परंपराओं को तो बचा लिया लेकिन पारसी धर्म ईरान की धरती से विलुप्त होने से न बचा सका ।

पैसे के बदले लिखे गए स्तुति गान और अपने आराध्य के लिए लिखे गये भक्ति गीतों में बहुत अंतर होता है ।

तुलसीदास पर चर्चा आगे जारी रहेगी ।

साभार:राजकमल गोस्वामी-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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