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जातीय इतिहास तो ऐसे भी लिखा जा सकता है

-राजकमल गोस्वामी की कलम से-

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Positive India: Rajkamal Goswami:
कुछ वर्षों बाद स्वतंत्र भारत का इतिहास कुछ इस तरह लिखा जाया करेगा ।

जिस तरह हज़ारों वर्ष पुराने समाज की बुराइयों को हवा देकर देश में आज भी जातिवाद फैलाया जा रहा है उसी तरह हमें आधुनिक इतिहास को भी उसी पुरातन दृष्टि से देखने की कोशिश करनी चाहिये । नव दृष्टिकोण से परिदृश्य कुछ यूँ बनता है:

एक सवर्ण बनिये गाँधी ने एक कुर्मी सरदार पटेल को ब्राह्मण जवाहर लाल के पक्ष में प्रधानमंत्री न बनने पर राज़ी कर लिया । कश्मीरी ब्राह्मण होने के नाते जवाहर लाल चाहते थे एक दाक्षिणात्य ब्राह्मण राजगोपालाचारी देश के राष्ट्रपति बनें मगर चूँकि कायस्थ तिकड़मबाज़ी में बड़े माहिर होते हैं इसलिए बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी बाज़ी मार ले गए । हालाँकि कतिपय दलित अफसरों का मानना है कि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को राष्ट्रपति न बना कर देश ने भारी चूक की है । संविधान के सामान्य वाचन से लगता है कि सारी शक्तियाँ राष्ट्रपति में ही निहित है बेचारे प्रधानमंत्री का नाम संविधान में बस एक आध जगह आता है इसलिये कायस्थ लॉबी धोखा खा गई । संविधान लागू हुआ तो पता चला कि वास्तविक शक्ति तो प्रधानमंत्री के पास थी जो एक पंडित ले उड़ा । खैर नेहरू के बाद कायस्थ लॉबी फिर सक्रिय हो गई और इस बार मौका न चूकते हुए कायस्थ शिरोमणि शास्त्री जी को प्रधानमंत्री बनाने में सफलता मिल गई । मगर यह खुशी ज़्यादा दिन चली नहीं और शास्त्री जी को ठिकाने लगा दिया गया ।

अब पहली बार ओबीसी किंगमेकर की भूमिका में नज़र आये । कामराज नाडार ओबीसी थे इसलिए अपने लिये तो बहुमत न जुटा पाये पर एक पुराने ब्राह्मण साथी मोरार जी को टंगड़ी मार कर अपने पुराने पंडित नेता के प्रति वफ़ादारी निभाते हुए उनकी बेटी को गूंगी बेटी समझ कर गद्दी पर बैठा दिया जिसने कुछ ही समय में कामराज को इतिहास के कूड़ेदान में पहुँचा दिया । और निजलिंगप्पा कांग्रेस अध्यक्ष बने । ये बेचारे हिंदू जाति व्यवस्था में कहाँ फंसते हैं यह शोध का विषय है । ये लिंगायत समुदाय के थे जो अब अलग धर्म होने का दावा करता है मगर इस समुदाय की स्थापना वसवन्ना नामक ब्राह्मण ने ही की थी । १९६९ में निजलिंगप्पा ने नीलम संजीव रेड़डी को राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा कर दिया और उधर इंदिरा जी की शह पर वीवी गिरि इस्तीफा देकर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बन गये ।

यहाँ तक आते आते जातियों में बड़ा गड्ड मड्ड हो जाता है । भारत में जातियाँ दो तरह की होती हैं एक तो वर्ण व्यवस्था तय करती है दूसरी संविधान तय करता है ।
रेड्डी लोग न ब्राह्मण हैं न क्षत्रिय न वैश्य न शूद्र ये लोग ब्राह्मणेतर अगड़ी जाति माने जाते हैं और वीवी गिरि का तो मामला अद्भुत है । गिरि समुदाय यूँ तो ओबीसी में लिस्टेड है पर वीवी गिरि तैलंग ब्राह्मण थे और गिरि तो थे ही । उनकी जाति भी संविधान की व्यवस्था में किस वर्ग में फंसती है यह शोध अधूरी ही छोड़ देते हैं ।
बीच में दो राष्ट्रपति छूट गये राधाकृष्णन ब्राह्मण थे और ज़ाकिर हुसैन पठान , दोनों अगड़ी जातियों के पुरोधा थे । वीवी गिरि के बाद फ़खरुद्दीन अली अहमद आये । कुछ लोग इन्हें अहमदिया भी कहते थे क्योंकि देश में एमरजेंसी इन्हीं ने लगाई थी । ये सिविल सर्जन के बेटे थे गवर्नमेंट स्कूल गोंडा से कैम्ब्रिज तक पढ़ाई की थी । ये कुलीन मुस्लिम थे और पिछड़ी जाति में तो नहीं आते थे ।

आपातकाल के बाद फिर एक ब्राह्मण मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने पर चल नहीं पाये और उत्तर प्रदेश के एक जाट नेता चरण सिंह ने उन्हें गद्दी से हटा दिया । एक प्रसिद्ध दलित आईपीएस कहते थे कि देश फिर ऐतिहासिक मोड़ पर एक दलित नेता जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाने से चूक गया हालाँकि नवगठित भाजपा ने बहुत कोशिश की कि वे प्रधानमंत्री बनें ।

पहली किस्त समाप्त हुई । आगे फिर कभी जातीय उद्वेग जागा तो यह इतिहास आगे बढ़ाऊंगा ।

नमस्ते सदावत्सले मातृभूमे !

साभार:राजकमल गोस्वामी-(में लेखक के अपने विचार हैं)

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