
अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने बंटोगे तो कटोगे का मंजर
-दयानंद पांडेय की कलम से-

Positive India: Dayanand Pandey:
अविमुक्तेश्वरानंद तो अपने मक़सद में फ़ौरी तौर पर क़ामयाब हो गए दिखते हैं । बताइए कि प्रयाग में आज उन की प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार दो पक्ष में बंट कर मार-पीट कर बैठे । पुलिस ने किसी तरह मामला संभाला । सोशल मीडिया पर सवर्ण लोगों में भी मार-काट मची हुई है । ख़ास कर ब्राह्मणों में ही आपस में तलवार तन गई है ।
योगी का सूत्र वाक्य बंटोगे तो कटोगे की ऐसी-तैसी हो गई है ।समूचा हिंदू समाज भयंकर रूप से बंट चुका है । ऐसे जैसे सनातन के सल्तनत की चूल हिल गई हो । 2015 में इन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद को काशी में पुलिस से बुरी तरह पिटवाने वाले अखिलेश यादव अब उन की रक्षा में सब से आगे खड़े हैं ।कभी राहुल गांधी के हिंदू होने पर सवाल उठाने वाले अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कांग्रेस भी समूची ताक़त से खड़ी हो गई है ।
बल्कि कांग्रेस और सपा में होड़ मची हुई है कि कौन ज़्यादा नज़दीक है अविमुक्तेश्वरानंद के । बस मायावती और ओवैसी की कमी रह गई है । कब वह भी या अन्य शेष लोग भी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ खड़े हो जाएं, कोई नहीं जानता । अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं कि नहीं , यह विवाद पीछे हो गया है । बहुत पीछे । बंटोगे तो कटोगे का मंज़र मुँह बा कर उपस्थित है ।
कांग्रेस और सपा का बढ़िया माहौल बन गया है । नवीन कुमार नबीन और पंकज चौधरी कैसे इस गड्ढे को पाटेंगे, पाट भी पाएंगे कि नहीं , यह देखना दिलचस्प होगा । क्यों कि इस बिंदु पर योगी का बुलडोजर , बुलडोज़ हो गया है । संभल और प्रयाग का फ़र्क़ है यह । तब और जब ब्राह्मणों के बीच का कांग्रेस और सपा का स्लीपर सेल सक्रिय हो चुका हो । यू जी सी क़ानून के तड़के ने बड़ी तीव्रता से इस मुद्दे को ज्वलनशील बना दिया है । स्वाभाविक होने का रंग भर दिया है । चटक रंग ।
साभार: दयानंद पांडेय-(में लेखक के अपने विचार हैं)