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महाराष्ट्र की टीसीएस में चला कारपोरेट जेहाद खेल

-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

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Positive India:Sarvesh Kumar Tiwari:
पहले महाराष्ट्र की टीसीएस, फिर अमरावती… चार चार लड़के मिल कर सैकड़ों लड़कियों को फंसा रहे हैं। एक एक के फोन में सैकड़ों लड़कियों की अश्लील वीडियो है। यह वे मामले हैं जो खुल जाते हैं, वरना ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों रैकेट लगातार चल रहे हैं। आपकी लड़कियां फंस रही हैं, कट रही हैं, बर्बाद हो रही हैं।

हालांकि इन सब के बाद भी मैं अपने इस मत पर डटा हुआ हूं कि लड़कियां अधिक दोषी नहीं हैं। उनसे अधिक दोषी उनका परिवार है, माता पिता हैं और एक हद तक सरकार भी है।

जिस उम्र में प्रेम का केमिकल लोचा होना है, उस उम्र में वह होगा ही होगा। इसे किसी भी तरह नहीं रोका जा सकता। पर मां बाप की यह भी जिम्मेवारी होती है कि वे बच्चे बच्चियों को सही और गलत में फर्क करना समझाएं। बच्चियों को यदि माता पिता न समझाएं तो उन्हें दूसरा कोई समझाने के लिए नहीं बैठा, उनके आस पड़ोस की सारी गतिविधियां उन्हें नरक में धकेलने के लिए ही लगी हुई हैं।

सोचिए न, एक अठारह साल की सामान्य लड़की के इर्द गिर्द क्या चल रहा है? इंस्टा, फेसबुक, रील, शॉट्स, वेब सीरीज… क्या इसमें एक भी ऐसा है जो उसे जाल में फंसने से बचाने का प्रयास कर रहा हो? नहीं। ये सारे पटल उसे जबरन उस जाल में धकेल रहे हैं।

स्कूल, कॉलेज, सरकार, किताबें… बच्चियों को सभी बता रहे हैं कि सारे देशवासी एक जैसे ही हैं। किसी में कोई अंतर नहीं। फिर वह किसी गैर मतावलंबी पर भरोसा कर ले तो क्या आश्चर्य? उसे तो जबरन याद कराया गया है कि सभी एक से ही हैं, प्यारे हैं।

सामान्य हिंदू अभिभावक अभी केवल और केवल बच्चों के कैरियर पर फोकस किए हुए है। बच्चा कुछ अच्छा कर ले, बड़ा कर ले… उसके बाद भले गड्ढे में गिर जाय, कोई फर्क नहीं पड़ता। बस आप पड़ोसी के सामने चौड़े हो कर बता सकें कि बिटिया मल्टिनेशनल कंपनी में मैनेजर हो गई है… फिर तो यही होगा न?

देश अभी तक पूरी तरह मान भी नहीं पाया है कि यहां लड़कियों को फंसाने के संगठित गिरोह काम कर रहे हैं। एक व्यक्ति बोल रहा हो तो दस उसको गलत बताने आ जाते हैं। ऐसे में अठारह बीस साल के बच्चों से यह उम्मीद कैसे की जाय कि वे नहीं फंसेंगे?

एक अपने पैरों पर खड़े होने की फर्जी अवधारणा भी है। आत्मनिर्भर होने के नाम पर चार चार हजार की नौकरी करने निकल पड़ी हैं आपकी लड़कियां। इतना सस्ता मजदूर तो संसार के किसी देश में नहीं मिलता। बेटियों को स्वतंत्रता देने की पहल हुई तो लोग इतनी अधिक स्वतंत्रता देने लगे कि बस घर से हांक दिया… जा, जिस तरह से जीना है जी ले… बच्चियां जी तो नहीं पा रहीं, कहीं न कहीं रोज शिकार हो रही हैं। मां बाप के हाथ में स्वतंत्रता का झुनझुना रह जाता है।

तनिक तलाशिए तो, क्या आपके समाज में ऐसा एक भी स्थान है जहां आपकी बच्चियों को धर्म से जोड़ने का प्रयास किया जाता हो? कोई एक प्रकल्प, जहां उन्हें जीवन जीने का ढंग सिखाया जाता हो? अपने पड़ोस की ही किसी एक किशोरी के बारे में सोचिए, क्या उसे किसी ने आज की सबसे भयावह सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास किया है? नहीं। फिर वह कैसे न फंसेगी?

समाज अभी भी इस बीमारी को लेकर जागरूक नहीं हुआ है।

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