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जब नट ने कहा चाहिए तुम्हारी कन्या का हाथ।

-सर्वेश कुमार तिवारी की कलम से-

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Positive India:Sarvesh Kumar Tiwari:
सूर्योदय अभी हुआ ही था। हिमांचल महाराज अभी गङ्गा स्नान से लौटे भी नहीं थे। देवी मैनावती पूजन के लिए वाटिका में पुष्प ले रही थीं कि अचानक कानों से एक दिव्य स्वर टकराया। अहा! इतना सुंदर तो स्वयं ईश्वर ही गा सकते हैं… कौन है यह अद्भुत गायक? अद्भुत आकर्षण है इसके स्वर में… अनायास ही उधर बढ़ गईं देवी…

“अहा! नारायण! अद्भुत तेज है इस वृद्ध के मस्तक पर। बाएं कंधे पर सारंगी लटक रही है, दाहिने हाथ में डमरू है। आयु की अधिकता के कारण कांप रहे वृद्ध ने कैसा लाल वस्त्र पहना है। ओहो… क्या अद्भुत नृत्य कर रहे हैं, क्या सुघर कंठ पाया है… माता सरस्वती की कृपा…” देवी मैनावती अंदर गईं और स्वर्ण थाल में मोती भर लाईं। “लो बाबाजी…”

“ई चांदी सोना हम का करब मइया? हमके ई ना चाहीं।” नट के मुख पर मुस्कान है।
“फिर क्या चाहिए़ बाबा? आदेश करो, घर का समूचा धन धान्य आपका है। राज के मालिक होंगे महाराज, घर की मालिकन हमीं होती हैं। बोलो बोलो…” लक्ष्मी का आत्मविश्वास चमक रहा है मुख पर। बोलो बोलो…

“चाहिए तुम्हारी कन्या का हाथ। बोलो, दे सकोगी?” कह कर नट नाचने लगा है। लगता है उसके साथ समूची सृष्टि नाच रही है। ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, समूचा ब्रह्माण्ड… डमरू का स्वर गूंज रहा है।

माता आश्चर्य में हैं। कौन है यह वृद्ध? बताओ तो, कन्या का हाथ मांग रहा है? हिमांचल महाराज भी आ गए गङ्गा स्नान से। वे भी आश्चर्य में हैं। बुढ़ापे में मति फिर गई है क्या इस नट की… वे सैनिकों को आदेश देते हैं, “हटावो इस नर्तक को…” दो सैनिक आगे बढ़ते हैं पर उन तक पहुँच नहीं पाते। उनके तेज के कारण दूर ही रह जाते हैं। उधर द्वार पर खड़ी गिरिजा मुस्कुरा उठी हैं।

हिमांचल महाराज चकित हैं। क्या माया है नारायण? वे ध्यान से देखते हैं बुजुर्ग नट की ओर। “अरे, इसका तो स्वरूप बदल गया। चतुर्भुज, चक्र, गदा… ओह। साक्षात नारायण। जय हो जय हो, बड़ी कृपा हुई नाथ…” अरे! यह तो फिर रूप बदल गया। ब्रह्मदेव? हां हां, वही वही… नहीं नहीं… सूर्य देव। वही सात अश्व, श्वेत वस्त्र… ओह! वह भी नहींं। इंद्रदेव हैं… ऐरावत, वज्र दिख रहा है। इंद्रदेव ही हैं… ना ना, अब तो ग्वाले जैसा दिख रहा है यह मानुष… अरे कौन हो नटराज? इतने रूप कैसे बदल रहे हो?

लो, फिर बदल लिए रूप? अब कौन? चंद्रमा के समान सुंदर मुख, लंबी जटाएं, कंठ में विष की तीन नीली रेखाएं, मस्तक से गङ्गा निकल रही हैं… कहीं शिव ही तो नहीं? अब रूप नहीं बदल रहा। शिव ही हैं, महादेव… तो क्या पूरी हो गई गिरिजा की प्रतीक्षा? शिव, ओ महादेव, ना ना पुत्र… दामाद!

मुग्ध हो गये हैं हिमांचल महाराज। अब नटराज नहीं नाच रहे, नाच रहा है हिमांचल जी का रोम रोम… आओ सदाशिव! योगीराज! पुत्र…

शिव अंतर्ध्यान हो गये। बहुत काम है रे बाबा। ब्रह्मा जी को बुलाना होगा, नारायण को भी, सभी देवताओं को… बारात सजानी है… लग गया गृहस्थी का चक्कर।

उधर हिमांचल मुग्ध हैं, मैनावती देवी अभी तक चकित हैं, और माता गिरिजा? अहा! उनके आनंद की सीमा नहीं… अंततः मिल ही गये शिव। मिल ही जाते हैं भोला बाबा, कोई मन से ढूंढे तो… हर हर महादेव।

बस यूं ही…
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

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