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जातिवाद के नाम पर एकतरफा नंगे नाच की सच्चाई

-सतीश चन्द्र मिश्रा की कलम से-

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Positive India:Satish Chandra Mishra:
जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है…
जातिवाद के नाम पर जो एकतरफा नंगनाच हो रहा है, सवर्णों/ब्राह्मणों के स्वघोषित तथाकथित ठेकेदारों की भुजाओं में अचानक रक्त की जगह तेजाब दौड़ता दिखाई देने लगा है… हालांकि इनमें सबसे तथाकथित विप्लवी ठेकेदार ने अंततः अपनी और अपने धूर्त एजेंडे की पराजय इस पराजित जयघोष के साथ स्वीकार कर ली है कि… “हां हम किसी को जिता भले नहीं सकते, लेकिन हरवा जरूर सकते हैं…”

विप्लवी ठेकेदार ने कोई नयी बात नहीं कही। पहले दिन से मैं यही कह और लिख रहा हूं, यूट्यूब पर खुलकर बोल भी रहा हूं कि, जातीय ज़हर का यह पूरा ड्रामा ही “किसी” को हरवाने का ठेका लेकर शुरू हुआ है। जानबूझकर नाम के बजाए “किसी” क्यों लिखा है, यह आगे समझ में आ जायेगा।

दरअसल UGC के सरासर झूठ पर शुरू हुए इस ड्रामे का खलनायक मोदी को बनाकर उसी सवर्ण विरोधी मोदी को हरवाने का दावा किया जा रहा है। लेकिन मोदी को अब चुनाव मैदान में मई 2029 में जाना है, इसलिए सच यह है कि तब तक मोदी का रोयां भी नहीं उखड़ना। इसलिए यह दावा ही आपकी आंख में धूल झोंकने के लिए है।
इससे पहले इसी वर्ष असम, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी में चुनाव होने हैं। इनमें तमिलनाडु केरल में यह मुद्दा यूज्ड कंडोम की हैसियत से ज्यादा नहीं, क्योंकि वहां वर्षों के बजाए दशकों से सवर्णों ने यह भोगा है लेकिन सवर्णों ने नंगई और नंगनाच के बजाए जो रास्ता निकाला उसका नतीजा यह है कि, आज अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट गूगल सरीखी टॉप 10 दुनिया की दस मल्टीनेशनल में से 10 के दस सवर्ण हैं उनमें से भी 9 ब्राह्मण हैं। इन राज्यों में भाजपा का भी चुनावी दांव बस इतना है कि, सीटें 5 आएंगी या दस। अब बचा बंगाल तो फ़िलहाल भाजपा वहां 77 से कितना ज्यादा आगे जाएगी सवाल इतना ही है। मूल तथ्य यह है कि, इन तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता से कोसों दूर है, इसलिए क्या और कितना नुकसान कर लेंगे ये ठेकेदार, यह आप स्वयं तय कर लीजिए। चौथा राज्य है असम तो वहां का मुद्दा घुसपैठियों और सीएम हिमंता के संघर्ष का ही है। अतः जातिवाद के स्वघोषित ठेकेदार और उनका एजेंडा वहां दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा।

सवर्ण विरोधी ठेकेदारों का पूरा नंगनाच यूपी तक ही केंद्रित है, आखिर क्यों.? यही खेल समझिए, नाम मोदी का लेंगे चोट योगी को देंगे, पिछली बार की 273 सीटों को घटाकर अगर 240, 245 तक या और नीचे कर ले गए तो एजेंडा 100% पूरा हो जायेगा। सरकार भी भाजपा की बन जायेगी, पर CM कोई और… बिल्कुल उसी तरह जिस तरह लगभग 2 साल पहले पड़ोस में शिवराज सिंह चौहान को रिकॉर्डतोड़ जीत के बाद भी चुपचाप किनारे लगवा दिया गया था। वैसा ही कुछ करतब करना योगी के साथ संभव नहीं हो पाएगा इसलिए सरल तरीका यह है कि, 273 के बजाय 223 सीटें ही आयें, तो भी चलेगा। योगी खुद कुछ कहने सुनने की स्थिति में नहीं होंगे क्योंकि 50 सीटें कम होने का जिम्मेदार उन्हीं को ठहरा दिया जायेगा। यह मत समझिए कि, सवर्णों के स्वघोषित ठेकेदारों को यह नहीं मालूम। इसीलिए उन्होंने अभी से यह कहना शुरू भी कर दिया है कि, “हां हम किसी को जिता भले नहीं सकते, लेकिन हरवा जरूर सकते हैं…”

बहुत संक्षेप में बहुत सरल तरीके से समझाने का प्रयास कौन किस को हरवाने का प्रयास क्यों कर रहा है। यह आप स्वयं तय कर लें। इसके लिए मायावती अचानक कूद ग़यी है मैदान में।
बस इतना ध्यान रखिए…
राजनीति में जो कहा जाता है, वो किया नहीं जाता।
जो किया जाता है, उसे कहा नहीं जाता।।

साभार:सतीश चन्द्र मिश्रा-(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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