www.positiveindia.net.in
Horizontal Banner 1

सोने की टोटी वाला सद्दाम हुसैन जब भिखारियों की तरह मिला

- दयानंद पांडेय की कलम से -

laxmi narayan hospital 2025 ad

Positive India: Dayanand Pandey:
एक समय था कि इराक़ का तानाशाह सद्दाम हुसैन अपने बाथरूम में सोने की टोटी लगाए था । सोने के टोटी से आए पानी से नहाता था । पर अपने अंतिम समय में अखिलेश यादव की तरह सोने की टोटी , टाईल नहीं ले जा पाया । लेकिन तब के दिनों अमरीका और उस के 35 मित्र राष्ट्रों को लंबे समय तक छकाता रहा । मित्र राष्ट्र की सेनाएं रोज़ ऐलान करतीं कि आज इतने टैंक मारे । यह किया , वह किया । पर सचमुच कुछ नहीं । क्यों कि सद्दाम हुसैन ने जगह-जगह रबर के टैंक खड़े किए था । रोज़ यही खड़े कर देता था ।

अमरीका और मित्र राष्ट्र हवाई हमला कर ख़ुश रहते । पर सद्दाम हुसैन का यह झांसा बहुत दिन नहीं चल पाया । अपना भूमिगत महल छोड़ कर सद्दाम हुसैन को भागना पड़ा । अमरीकी सैनिकों ने जब सद्दाम हुसैन को गिरफ़्तार किया तब वह एक कच्चे , मिट्टी वाले बंकर में लेटा हुआ मिला । बंकर क्या लगभग कब्र थी वह । ऊपर लकड़ी के पटरे से ख़ुद को ढँक कर छुपा पड़ा था । दीनहीन दशा में । भिखरियों की तरह । लस्त-पस्त ।

यहाँ तक कि गिरफ़्तार होने के बाद भी वह लगातार बताता रहा कि मैं सद्दाम हुसैन नहीं हूं । लेकिन भिखारियों की तरह दिखने वाला वह सद्दाम हुसैन ही था । अंतत: सद्दाम हुसैन को फाँसी हुई ।

मुस्लिम जगत में मातम मना ।

अब वह एक था सद्दाम हुसैन कहलाने के क़ाबिल भी नहीं रहा । मुस्लिम जगत ही उसे भूल चुका है । सद्दाम हुसैन को अपने रासायनिक हथियारों पर बड़ा भरोसा था । मुस्लिम ब्रदरहुड पर बड़ा भरोसा था । और सब से बड़ी बात कि तेल के कुएं पर बड़ा नाज़ था । पर उस की ज़िद , सनक और तानाशाही में कुछ काम न आया ।

ईरान के ख़ोमाईंनी भी अब सद्दाम हुसैन की राह पर चलते हुए उसी दुर्गति को प्राप्त होने को उत्सुक दिखते हैं । किसी अज्ञात बंकर में छुपे हुए । एक पुरानी कहावत याद आती है कि बातें चाहे कोई जितनी और जैसी भी कर ले पर उछलना अपने ही दम पर चाहिए । इस लिए भी कि मुस्लिम ब्रदरहुड की सरहद सिर्फ़ आतंक तक ही है ।

सीधी लड़ाई में अब मुस्लिम ब्रदरहुड अपनी हैसियत जितनी जल्दी जान ले बेहतर है । तेल के कुएं अब उस का कवच-कुंडल बनने को तैयार नहीं हैं । तेल के कुएं , आतंक और ख़ून खराबा करने का लाइसेंस जब देते थे , तब देते थे । अब वह दिन विदा हुए ।

विदा हुए वह दिन जब तलवार के दम पर पारसियों के ईरान को मुस्लिम ईरान बना कर उसे जहन्नुम बना दिया । आतंक का पर्याय बना दिया । यह तलवार नहीं , विज्ञान , तकनीक , डिप्लोमेसी और बुद्धि का दिन है । मनुष्यता और व्यवसाय का है । अब हर चीज़ का विकल्प है । तेल और तेल के कुएं का भी । सर्वदा आतंक की ध्वजा फहराने वाले मुस्लिम ब्रदरहुड के तहस-नहस का भी ।

साभार: दयानंद पांडेय-(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Leave A Reply

Your email address will not be published.